कोरोना वायरस की वजह से आर्कटिक में चल रहे कई महत्वपूर्ण शोध भी टल गए हैं। यहां पिघल रहे बर्फ और ध्रुवीय भालुओं के पर्यावरण से जुड़े संबंध को लेकर कई अहम अभियान संकट में हैं। एक के बाद एक कई देशों में लॉकडाउन की वजह से यहां जाने वाले वैज्ञानिक अब जर्मनी के ब्रेमरहेवन बंदरगाह पर फंसे हैं। दूसरी ओर वहां मौजूद वैज्ञानिक धीरे-धीरे करके निकाले जा रहे हैं। ऐसे में शोध केंद्र पर डाटा भी नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों की उम्मीद अब वहां रखे 11 मीटर के एक उपकरण पर टिकी है जो वहां के सारे डाटा इकट्ठा करता है। अगर खराब मौसम में यह उपकरण नष्ट हो गया तो वर्षों की मेहनत पर पानी फिर सकता है।
उत्तरी ध्रुव का सबसे खतरनाक मिशन
जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है। आर्कटिक का हमारी धरती की आब-ओ-हवा पर कैसा और कितना असर है? जलवायु परिवर्तन से इसमें क्या बदलाव आ रहे हैं? ऐसे ही कई सवालों के जवाब तलाशने के लिए जर्मनी का आइसब्रेकर आरवी पोलरस्टर्न जहां अमेरिका, रूस और चीन सहित 17 देशों के वैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिक उपकरणों के साथ भेजा गया है। इसे उत्तरी ध्रुव का सबसे खतरनाक मिशन बताया जाता है।
रोकना पड़ सकता है शोध
ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान के लिए ऑल्फ्रेड वेगेनर के आयोजकों ने पिछले महीने जर्मन जहाज पर तैनात कुछ वैज्ञानिकों को कनाडा होते हुए हवाई माध्यम से निकाला था। चालक दल के अन्य सदस्यों को दो अन्य जर्मन अनुसंधान पोतों की मदद से निकाला जाएगा। ऐसे में शोध रोकना पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन के लिए मिशन अहम
जर्मनी के ब्रेमरहेवन बंदरगाह से एक वीडियो साक्षात्कार में कोलराडो यूनिवर्सिटी के वातावरणीय वैज्ञानिक और मोजेक खोज अभियान के सह-अगुवा मैथ्यू शूपे बताते हैं कि इस मिशन का लक्ष्य जलवायु परिवर्तन का अनुमान लगाने के लिए प्रयुक्त होने वाले प्रतिरूपों में सुधार करना है।
हटना होगा पोलरस्टर्न को
वैज्ञानिकों को वहां से निकाले जाने से पोलरस्टर्न को आर्कटिक चक्र में इस अहम समय में कम से कम तीन हफ्तों के लिए अपनी मौजूदा स्थान से हटना पड़ेगा। शूपे ने बताया कि यह महत्त्वपूर्ण समय है जब समुद्री बर्फ के पिघलने का मौसम शुरू होगा और यह पोत के वहां से हटने के बाद होगा।