चीन के दुनिया में बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर रणनीति बनाने की कोशिश कर रहे हैँ। इसके जरिए वे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का जवाब देना चाहते हैँ। सबसे पहले ये बात बीते मार्च में सामने आई थी। तब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से फोन पर बातचीत में ऐसा सुझाव रखा था। बाद में जॉनसन ने कहा- ‘मैंने लोकतांत्रिक देशों को साथ लेकर वैसी ही एक पहल करने का सुझाव दिया है, ताकि दुनिया में जो समुदाय जरूरत महसूस कर रहे हों, उनकी मदद की जा सके।’
इसके पहले फरवरी में बाइडन ने कहा था कि इन्फ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्रों में अमेरिका के चीन से पिछड़ने का खतरा पैदा हो गया है। इस बीच बीते शुक्रवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने अफ्रीकी देशों को सलाह दी कि उन्हें चीन के इन्फ्रास्ट्रक्चर कर्ज योजना की जांच-परख करनी चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि बाद में चीन बनाए गए इन्फ्रास्ट्रक्चर का मालिक बन बैठे। इस बयान के बाद अब ये कयास लगाए जाने लगे हैं कि अमेरिका और उसके साथी देश उन देशों के सामने अपना विकल्प नए सिरे से रख सकते हैं, जहां चीन बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट चला रहा है। चीन ने बीआरआई परियोजना 2013 में शुरू की थी।
इसके तहत एशिया को यूरोप से होते हुए अफ्रीका से जोड़ने के लिए बंदरगाह, पुल, रेलवे और दूसरे इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाए जा रहे हैं। इन सबके लिए धन मोटे तौर पर चीन ही देता है। डोनाल्ड ट्रंप के समय में अमेरिका और जापान ने इसके जवाब में एशियन डेवलपमेंट बैंक के जरिए इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश को बढ़ाने की कोशिश की थी। 2019 में अमेरिका ने प्राइवेट सेक्टर संचालित ब्लू डॉट नेटवर्क परियोजना शुरू की। इसके तहत एशिया प्रशांत क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की योजना बनाई गई है।
इससे पहले 2018 में यूरोपियन यूनियन ने कनेक्टिंग यूरोप विद एशिया परियोजना शुरू की थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और उसके साथी देश बुनियादी ढांचा विकसित करने के मामले में चीन की परियोजना का मुकाबला कर पाएंगे, इसकी संभावना कम है। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम के मलेशिया कैंपस में असिस्टैंट प्रोफेसर बेंजामिन बार्टन ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा कि पश्चिमी देशों के प्रयासों में तालमेल की कमी है।
उन्होंने कहा- ‘ये कोशिशें छिटपुट और अलग-थलग रही हैं। उनके वास्तव में शुरू होने के समय में भी अंतर है।’इसके विपरीत चीन 140 देशों के साथ 200 से ज्यादा ‘सहयोग समझौतों’ पर दस्तखत कर चुका है। रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पिछले नवंबर में एक रिपोर्ट में बताया था कि 2014 के बाद से चीन बीआरआई के तहत 700 अरब डॉलर से अधिक की परियोजनाएं पूरी कर चुका है। हालांकि चीन ने हाल में ये कहा कि कोरोना महामारी के कारण बीआरआई परियोजना के 40 फीसदी हिस्से पर खराब असर पड़ा है।
अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफेसर मिन यी ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा कि अमेरिका के पास विदेशों में परियोजनाएं चलाने के लिए संसाधन, इच्छाशक्ति और अनुभव की कमी है। यूरोप के पास अनुभव और टेक्नलॉजी है, लेकिन उसके पास धन नहीं है। उन्होंने कहा कि सिर्फ जापान ही ऐसा देश है, जो चीन के मुकाबले इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने में सक्षम है, लेकिन जापान की गतिविधियां एशिया तक सीमित हैँ। फिर कोरोना महामारी के बाद उसके लिए बड़े पैमाने पर महंगे इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश और भी मुश्किल हो गया है।
सिंगापुर स्थित इंटरनेशन इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज में एशिया कार्यालय के कार्यकारी निदेशक जेम्स क्रैबट्री ने कहा कि बहुत से देशों ने चीन का मुकाबला करने की जरूरत महसूस की है। वे बीआरआई का विकल्प पेश करने के लिए मिल कर काम कर रहे हैं। क्रैबट्री ने कहा कि चीन ने जिस पैमाने पर निवेश किया है, उसका मुकाबला वे पाएंगे, यह तो संभव नहीं है, इसके बावजूद वे बेहतर शर्तों पर कर्ज मुहैया करा सकते हैं।
वाशिंगटन स्थित ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के चाइना सेंटर में सीनियर फेलॉ डेविड डॉलर ने कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन और जापान पहले से ही अफ्रीका को स्वास्थ्य, शिक्षा और शासन के क्षेत्रों में अनुदान दे रहे हैँ। चीन की फंडिंग परिवहन और बिजली के क्षेत्रों में है। डॉलर ने कहा कि वित्तीय सीमाओं को देखते हुए इस बात की संभावना नहीं है कि पश्चिमी देश परिवहन और बिजली जैसे क्षेत्रों में धन लगा पाएंगे। उन्होंने कहा- ‘इसलिए चीन का मुकाबला करने की बात असल में सिर्फ बात ही है।’