1950 के दशक में कोई सोच नहीं सकता था कि पाकिस्तान और चीन कभी बेहतरीन दोस्त होंगे और दोस्ती भी इतनी गहरी कि कई प्रकार की मुश्किलों का सामना करने के बाद भी यह बरकरार रहेगी। यह तो बिल्कुल भी नहीं सोचा गया था कि चीन के लिए पाकिस्तान इस्रायल जैसा बन जाएगा।
कभी प्राथमिकता में भारत महत्वपूर्ण था
तब पाकिस्तान भौगोलिक दृष्टि से चीन के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण था। ऐतिहासिक सिल्क रूट का रास्ता भी था और उस वक़्त तक वो अमेरिका का सामरिक मित्र भी नहीं बना था लेकिन तब चीन के लिए भारत की प्राथमिकता कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।
चीन और भारत के बीच शुरू से ही दोस्ताना संबंध बनने लगे थे. दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों का आना जाना शुरू हो चुका था। इस पृष्ठभूमि में जब चीन के पहले प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने पाकिस्तान का दौरा किया, तो वहाँ उनकी बहुत प्रशंसा की गई।
1956 में चाउ एन लाई के दौरे से चीन और पाकिस्तान के बीच संबंधों के एक नए युग की शुरुआत के बावजूद दोनों मुल्कों के बीच प्रगाढ़ दोस्ती जैसी कोई अवधारणा नहीं थी।
इस बात का प्रमाण उस यात्रा के बाद पाकिस्तान के चीन में तत्कालीन राजदूत सुल्तानुद्दीन अहमद और प्रधानमंत्री चाउ एन लाई के बीच हुई मुलाकात से मिलता है जिसमें वह पाकिस्तान से कश्मीर को लेकर किसी भी सैन्य कार्रवाई से परहेज़ करने को कहते हैं। चाउ एन लाई के साथ सुल्तानुद्दीन अहमद की बातचीत का ब्यौरा वुडरो विल्सन सेंटर के आर्काइव्स में मौजूद है।
इसके मुताबिक प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने बार-बार पाकिस्तानी राजदूत को यह बताने की कोशिश की कि वे और श्रीलंका इस बात से बहुत चिंतित हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव हो सकता है और इससे पूरे क्षेत्र के विकास और समृद्धि पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को युद्ध से बचना चाहिए और आपसी बातचीत के जरिए कश्मीर विवाद का हल करना चाहिए। उन्होंने पाकिस्तानी राजदूत को यह तक समझाने की कोशिश की कि अगर यह संघर्ष हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप बढ़ेगा जिसका पाकिस्तान को लाभ नहीं होगा।
इसके साथ ही अमेरिका का हस्तक्षेप बढ़ेगा, जो पहले से ही इस क्षेत्र पर नज़रें गड़ाए हुए है। लेकिन बैठक में पाकिस्तानी राजदूत भारत विरोधी और भारत से खतरे की बात दोहराते रहे तो चीनी नेता उनसे धैर्य रखने का आग्रह करते रहे।