साल 2014 में जोशुआ वांग तब दुनिया की नजरों में आए थे, जब उन्होंने 'अम्ब्रेला मूवमेंट' चलाया था। इसमें हांगकांग में लोकतंत्र की मांग और मतदान के अधिकारों में बढ़ोतरी की मांग की गई थी। तब उनकी उम्र महज 19 साल थी। इसी आंदोलन के कारण प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने जोशुआ का नाम साल 2014 के सबसे प्रभावी किशोरों में शामिल किया था।
सिर्फ यही नहीं, साल 2015 में फॉर्च्युन मैगजीन ने उन्हें 'दुनिया के महानतम नेताओं' की श्रेणी में शामिल किया था। इसके अलावा पिछले साल यानी साल 2018 में वांग नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किए गए थे। तब उनकी उम्र महज 22 साल थी। जोशुआ फिलहाल हांगकांग की राजनीतिक पार्टी डेमोसिस्टो के महासचिव हैं। उन्होंने महज 19 साल की उम्र में यह पार्टी बनाई थी।
पिछले दिनों हांगकांग प्रशासन एक विधेयक लेकर आया था, जिसके मुताबिक अगर हांगकांग का कोई व्यक्ति चीन में कोई अपराध करता है या प्रदर्शन करता है तो उसके खिलाफ हांगकांग में नहीं बल्कि चीन में मुकदमा चलाया जाएगा।
बस फिर क्या था, जोशुआ वांग (23) के नेतृत्व में हांगकांग के युवाओं ने इस विधेयक के खिलाफ बिगुल फूंक दिया और सड़कों पर उतर चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने लगे। देखते ही देखते हांगकांग की सड़कों पर लाखों की संख्या में युवा जमा हो गए।
दरअसल, हांगकांग की युवा आबादी को लगा कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी इस विधेयक के जरिए हांगकांग पर अपना दबदबा कायम करना चाहती है। हालांकि लगातार और जोरदार प्रदर्शन को देखते हुए हांगकांग की सरकार ने विधेयक तो वापस ले लिया, लेकिन युवाओं का आंदोलन खत्म नहीं हुआ। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि हांगकांग में लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिक मजबूत हो।
जिस तरह जम्मू-कश्मीर में भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी वहां का संविधान और नियम-कानून पहले भारत के संविधान से अलग थे, कुछ इसी तरह के कानून हांगकांग में भी हैं। वैसे तो हांगकांग आधिकारिक तौर पर चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है, लेकिन 'एक देश, दो नीति' के अंतर्गत यहां की अपनी मुद्रा, कानून प्रणाली, राजनीतिक व्यवस्था, अप्रवास पर नियंत्रण और सड़क के नियम हैं। केवल विदेशी मामलों और रक्षा को छोड़कर हांगकांग को सभी क्षेत्रों में 'उच्च स्तर की स्वायत्तता' प्राप्त है। यहां के विदेशी मामले और रक्षा से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी चीन सरकार की है।
हांगकांग पहले ब्रिटेन के कब्जे में था। एक व्यापारिक बंदरगाह के रूप में आबाद होने के बाद हांगकांग 1842 में ब्रिटेन का विशेष उपनिवेश बन गया था, लेकिन 1843 में चीन ने इसे ब्रिटेन से खरीद लिया। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हांगकांग पर जापान ने कब्जा कर लिया था। बाद में जब जापानी सैनिक मारे गए तो हांगकांग फिर से चीन के कब्जे में आ गया। 19 दिसंबर, 1984 को चीन और ब्रिटेन के बीच हांगकांग ट्रांसफर एक्सचेंज (चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा) पर हस्ताक्षर किए गए और तब से यह चीन का एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बन गया।