दुनिया में गरीबी की असली वजह क्या है...संसाधनों की कमी या संसाधनों का असमान बंटवारा। ऑक्सफैम की ताजा रिपोर्ट इस बहस को नई दिशा देती है। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने टैक्स से बचने के लिए विदेशों में इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो करीब 410 करोड़ लोगों यानी आधी वैश्विक आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह खुलासा वैश्विक आर्थिक ढांचे में मौजूद गहरी खाई को उजागर करता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक कठोर सच्चाई यह है कि दौलत का बड़ा हिस्सा बेहद सीमित हाथों में सिमटता जा रहा है और उसका भी एक महत्वपूर्ण भाग पारदर्शी व्यवस्था से बाहर रखा गया है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि सुपर-रिच वर्ग अपनी संपत्ति को टैक्स हेवन और गुप्त वित्तीय तंत्रों के जरिए छिपाकर रख रहा है, जिससे असमानता और ज्यादा गहराती जा रही है।रिपोर्ट के अनुसार 2024 में करीब 3.55 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति विभिन्न टैक्स हेवन देशों और ऑफशोर खातों में रखी गई।
तुलना करें तो यह रकम फ्रांस की पूरी अर्थव्यवस्था से भी अधिक है और दुनिया के 44 सबसे कमजोर देशों की कुल जीडीपी के मुकाबले दोगुने से ज्यादा बैठती है। यह सिर्फ छिपी हुई संपत्ति नहीं, बल्कि एक समानांतर वित्तीय दुनिया का संकेत है।
पनामा पेपर्स के बाद भी नहीं टूटा सिलसिला
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के टैक्स विशेषज्ञ क्रिश्चियन हॉलम के मुताबिक पनामा पेपर्स ने वैश्विक वित्तीय गोपनीयता के उस नेटवर्क को उजागर किया था, जहां अमीर अपनी संपत्ति को टैक्स और निगरानी से दूर रखते हैं। लेकिन एक दशक बाद भी यह प्रवृत्ति जारी है।
टैक्स बचत का असर आम जनता पर
रिपोर्ट इस मुद्दे को केवल वित्तीय नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के नजरिए से देखती है। जब बड़ी संपत्ति वाले लोग टैक्स से बचते हैं, तो सरकारों के पास सार्वजनिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है और असमानता का चक्र और मजबूत होता है।