प्रसिद्ध भारतीय लेखक गुरचरण दास को स्वतंत्रता और उदारवाद के क्षेत्र में योगदान के लिए लाइफटाइम लिबर्टेरियन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय लेखक हैं। काठमांडू में आयोजित समारोह में दास ने ‘आंतरिक स्वतंत्रता’ को भारत का विशेष योगदान बताया और दुनिया में घटती स्वतंत्रता पर चिंता जताई।
प्रसिद्ध भारतीय लेखक और विचारक गुरचरण दास को स्वतंत्रता और उदारवाद के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान के लिए प्रतिष्ठित लाइफटाइम लिबर्टेरियन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय लेखक हैं। उन्हें यह पुरस्कार नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित लिबर्टी इंटरनेशनल के 40वें वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस में दिया गया। 82 वर्षीय गुरचरण दास ने सम्मान मिलने पर खुशी जताई। उन्होंने अपने संबोधन में ‘आंतरिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा पर बात की। उन्होंने कहा कि यह भारत का पश्चिमी उदारवाद की अवधारणा में एक अनोखा योगदान है। उन्होंने कहा, 'आप जिस चीज को दिल से सही मानते हैं, उसके लिए जीवन आपको कितनी बार पुरस्कृत करता है?'
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आयोजकों के अनुसार, दास ने तीन दशकों से अधिक समय तक अपने लेखन के जरिए भारत में आर्थिक स्वतंत्रता, उद्यमिता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श को प्रभावित किया है। उनकी प्रमुख पुस्तकों में इंडिया अनबाउंड, द डिफिकल्टी ऑफ बीइंग गुड, कामा: द रिडल ऑफ डिजायर और अनदर सॉर्ट ऑफ फ़्रीडम शामिल हैं। गुरचरण दास ने एक उपन्यास, निबंधों की पुस्तक और नाटकों का संग्रह भी लिखा है। उन्होंने पेंगुइन के लिए भारत के आर्थिक और कारोबारी इतिहास पर 17 खंडों वाली पुस्तक का संपादन भी किया है।
लेखन में आने से पहले दास प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में पढ़ाई की। वह सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के ट्रस्टी बोर्ड के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लिबर्टी इंटरनेशनल की स्थापना 1982 में हुई थी। संगठन स्वतंत्र और खुले समाज के विचारों को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर के विद्वानों, उद्यमियों और नीति विशेषज्ञों को जोड़ता है। दास ने कहा कि ऐसे समय में, जब दुनिया में स्वतंत्रता कम हो रही है, संगठन का काम पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।