दुनिया के सबसे बड़े तेल संयंत्र पर ड्रोन हमले से तेल की कीमतों में उछाल आ गया है। बीते कुछ दशकों में ये सबसे तेज उछाल है और इसने मध्य-पूर्व में एक नए संघर्ष का ख़तरा पैदा कर दिया है। लेकिन इसका असर कई हजार किलोमीटर दूर तक महसूस किया जा रहा है।
ये अब इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन कब तक बाधित रहता है। सऊदी अरब का कहना है कि संयंत्रों को ठीक करने में उसे कुछ दिन लगेंगे। लेकिन अगर और ज्यादा वक़्त लगता है तो इससे तेल की कीमतों पर और असर पड़ेगा और हो सकता है इससे भारत में आयात की कीमत और बढ़ जाए।
भारत सरकार पहले ही अर्थव्यवस्था के मामले में बुरे दौर से गुजर रही है और अगर कीमतें बढ़ती हैं तो भारत की मुश्किलें भी बढ़ेंगी।
अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ेंगी। ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी तो इससे मैन्युफेक्चरिंग और एविएशन समेत कई उद्योगों पर असर पड़ेगा, इससे महंगाई और बढ़ जाएगी।
कच्चे तेल के बाय-प्रोडक्ट, प्लास्टिक और टायर जैसे उत्पादों में इस्तेमाल होते हैं, ये चीजें भी और महंगी हो जाएंगी। तेल की बढ़ती कीमतों का असर मुद्रा पर भी पड़ता है। अगर कच्चे तेल का डॉलर प्राइज बढ़ेगा तो भारत को उतने ही तेल के लिए और डॉलर ख़रीदने होंगे। इससे डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरेगी।
भारत के शेयर बाजार में और कमजोरी पहले ही देखी जा चुकी है। बढ़ती तेल कीमतों से अर्थव्यवस्था को और नुकसान होने के डर से उसमें लगातार दूसरी बार गिरावट आई।
केयर रेटिंग लिमिटेड के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनविस कहते हैं, "सरकार अभी ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगी। वो हमारे पास मौजूद भंडार से आपूर्ति कर सकती है, जिससे करीब एक महीने के लिए मदद मिल सकती है। अगर संकट बना रहता है तो वो करों में कटौती कर सकती है, लेकिन इससे राजस्व पर और फिर राजकोषीय घाटे पर असर पड़ेगा। लेकिन जब तक कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से कम रहती है, तब तक इस झटके को सहा जा सकता है।"