लेबनान के हिज्बुल्ला नेता ने सऊदी अरब पर लेबनान के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया है। ताकतवर हिज्बुल्ला शिया आंदोलन को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जो लेबनान और इस इलाके में तनाव बढ़ाने के लिए सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराता रहा है।
तो लेबनान का सियासी संकट हो या फिर सीरिया और इराक में जारी संघर्ष। इनमें शिया-सुन्नी विवाद की गूंज सुनाई देती है।
मतभेद के बुनियादी कारण
लेकिम इस मतभेद के बुनियादी कारण क्या हैं? क्या आप ये जानते हैं। सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थल है और इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है।
सऊदी दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों और धनी देशों में से एक है। सऊदी अरब को डर है कि ईरान मध्य-पूर्व पर हावी होना चाहता है और इसीलिए वह शिया नेतृत्व में बढ़ती भागीदारी और प्रभाव वाले क्षेत्र की शक्ति का विरोध करता है।
शिया और सुन्नियों में अंतर
मुसलमान मुख्य रूप से दो समुदायों में बंटे हैं- शिया और सुन्नी। पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के तुरंत बाद ही इस बात पर विवाद से विभाजन पैदा हो गया कि मुसलमानों का नेतृत्व कौन होगा।
मुस्लिम आबादी में बहुसंख्यक सुन्नी हैं और अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इनकी संख्या 85 से 90 प्रतिशत के बीच है। दोनों समुदाय के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं और उनके अधिकांश धार्मिक आस्थाएं और रीति रिवाज एक जैसे हैं।
सांप्रदायिक विभाजन
इराक के शहरी इलाकों में हाल तक सुन्नी और शियाओं के बीच शादी बहुत आम बात हुआ करती थीं। इनमें अंतर है तो सिद्धांत, परम्परा, कानून, धर्मशास्त्र और धार्मिक संगठन का। उनके नेताओं में भी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है।
लेबनान से सीरिया और इराक़ से पाकिस्तान तक अधिकांश हालिया संघर्ष ने साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ाया है और दोनों समुदायों को अलग-अलग कर दिया है।
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सुन्नी कौन हैं?
सुन्नी खुद को इस्लाम की सबसे धर्मनिष्ठ और पारंपरिक शाखा से मानते हैं। सुन्नी शब्द 'अहल अल-सुन्ना' से बना है जिसका मतलब है परम्परा को मानने वाले लोग।
इस मामले में परम्परा का संदर्भ ऐसी रिवाजों से है जो पैगंबर मोहम्मद और उनके करीबियों के व्यवहार या दृष्टांत पर आधारित हो।
सुन्नी उन सभी पैगंबरों को मानते हैं जिनका जिक्र कुरान में किया गया है लेकिन अंतिम पैगंबर मोहम्मद ही थे। इनके बाद हुए सभी मुस्लिम नेताओं को सांसारिक शख्शियत के रूप में देखा जाता है। शियाओं की अपेक्षा, सुन्नी धार्मिक शिक्षक और नेता ऐतिहासिक रूप से सरकारी नियंत्रण में रहे हैं।
शिया कौन हैं?
शुरुआती इस्लामी इतिहास में शिया एक राजनीतिक समूह के रूप में थे- 'शियत अली' यानी अली की पार्टी। शियाओं का दावा है कि मुसलमानों का नेतृत्व करने का अधिकार अली और उनके वंशजों का ही है। अली पैगंबर मोहम्मद के दामाद थे।
मुसलमानों का नेता या खलीफा कौन होगा, इसे लेकर हुए एक संघर्ष में अली मारे गए थे। उनके बेटे हुसैन और हसन ने भी खलीफा होने के लिए संघर्ष किया था। हुसैन की मौत युद्ध क्षेत्र में हुई, जबकि माना जाता है कि हसन को जहर दिया गया था।
इन घटनाओं के कारण शियाओं में शहादत और मातम मनाने को इतना महत्व दिया जाता है। अनुमान के अनुसार, शियाओं की संख्या मुस्लिम आबादी की 10 प्रतिशत यानी 12 करोड़ से 17 करोड़ के बीच है।
ईरान, इराक, बहरीन, अजरबैजान और कुछ आंकड़ों के अनुसार यमन में शियाओं का बहुमत है। इसके अलावा, अफगानिस्तान, भारत, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सीरिया, तुर्की, सउदी अरब और यूनाइडेट अरब ऑफ अमीरात में भी इनकी अच्छी खासी संख्या है।