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सस्ते मगर बेहद खतरनाक होते हैं रासायनिक हथियार

Thu, 19 Apr 2018 06:17 PM IST
बीबीसी हिंदी
chemical attack syria - फोटो : reuters
सात अप्रैल को सीरिया की राजधानी दमिश्क के पास डूमा शहर में कथित रासायनिक हमले में 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। एक वीडियो सामने आया था, जिसमें कुछ बच्चे सांस लेने के लिए जूझते हुए नजर आ रहे थे। इस घटना ने सभी को सकते में डाल दिया।


इस हमले के लिए सीरिया में बशर अल-असद सरकार को जिम्मेदार मानते हुए अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर सीरिया के कुछ ठिकानों पर मिसाइलों से हमला कर दिया। सीरिया के सहयोगी रूस ने इन हमलों का विरोध किया, मगर यूरोपीय संघ आदि हमले के समर्थन में थे।

सवाल उठता है कि जब सीरिया में इतने दिनों से चल रही लड़ाई में जानमाल का भारी नुकसान हो रहा है, हर तरह के हथियार इस्तेमाल हो रहे हैं, तो फिर डूमा पर हुए कथित रासायनिक हमले पर इतना आक्रोश कैसे फैल गया? रासायनिक हथियारों का इतना विरोध क्यों होता है?


विज्ञान पत्रकार पल्लव बागला कहते हैं कि दूसरे हथियारों के मुकाबले रासायनिक हथियारों को ज्यादा खतरनाक माना जाता है।

वो बताते हैं, "हर हथियार तबाही लाता है और उसके नुकसान का एक पैमाना होता है। डायनामाइट, टीएनटी या न्यूक्लियर हथियार की अपनी क्षमता होती है। इसी तरह केमिकल वेपन्स को बुरा माना जाता है क्योंकि मारक क्षमता ज्यादा होती है और आम जनता को ज्यादा नुकसान होता है।''

''इसे आप टारगेट नहीं कर पाते कि आर्म्ड फोर्सेज ही निशाना बनें। इनका प्रभाव पूरे शहर में हो जाता है। इसीलिए इन्हें इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके बावजूद ये हथियार कभी-कभी इस्तेमाल होते हैं। अमरीका ने भी वियतनाम युद्ध के दौरान ऐसे हथियार इस्तेमाल किए थे।"

तबाही मचाने वाले हथियार

रासायनिक हथियारों को वेपन्स ऑफ मास डिस्क्ट्रक्शन यानी भयंकर तबाही मचा देने की क्षमता रखने वाले हथियारों की श्रेणी में रखा जाता है। इस श्रेणी में रेडियोलॉजिकल, जैविक और परमाणु हथियार भी शामिल हैं। इन सबमें से रासायनिक हथियारों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है।

इसकी वजह के बारे में पल्लव बागला बताते हैं, "ये पुअर मेन्स वेपन कहे जाते हैं। यानी रासायनिक हथियारों को बनाना, इनका रख-रखाव करना और इन्हें इस्तेमाल करना बहुत आसान है। इसकी मारक क्षमता भी ज्यादा होती है। इसी कारण ये इस्तेमाल किए जाते हैं।''

''वहीं जैविक हथियारों का इस्तेमाल कम देखा गया है और युद्ध के समय तो इनका कोई जिक्र नहीं है। दूसरी तरफ परमाणु हथियार बहुत मंहगे हैं और अब तक एक ही बार इस्तेमाल हुए हैं, जब अमरीका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए थे।"

जानकार बताते हैं कि जिस देश के पास औद्योगिक क्षमता है, वह आसानी से रासायनिक हथियार बना सकता है। उदाहरण के लिए क्लोरीन गैस, जिसके सीरिया में कई मौकों पर इस्तेमाल होने की बात सामने आ चुकी है।

क्लोरीन गैस को लेकर विज्ञान पत्रकार पल्लव बागला बताते हैं, "क्लोरीन का आमतौर पर बहुत इस्तेमाल होता है। वॉटर फिल्टरेशन प्लांट में इसका इस्तेमाल होता है, इसे बड़े पैमाने पर तैयार किया जाता है और सिलिंडर में ट्रांसपोर्ट किया जाता है। इस गैस का पूरी दुनिया में आम इस्तेमाल होता है। इसे केमिलकल वॉर में इस्तेमाल करना बहुत आसान है।" 

रासायनिक हथियारों के 100 साल

रासायनिक पदार्थों को आधुनिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का सिलसिला 100 साल पहले शुरू हुआ। इसकी शुरुआत क्लोरीन से हुई थी मगर इन 100 सालों में बेहद घातक केमिकल वेपन तैयार हो चुके हैं।

यूके केमिकल बायोलॉजिकल ऐंड न्यूक्लियर रेजिमेंट के पूर्व कमांडर हमीश डि ब्रेटन-गॉर्डन रासायनिक हथियारों के बारे में गहरी जानकारी रखते हैं और वह सीरिया में भी रह चुके हैं। केमिकल वेपन्स के इतिहास के बारे में वह बीबीसी को बताते हैं, "क्लोरीन सबसे पहला रासायनिक हथियार था। यह दम घोंटता है। वैसे तो इसका मकसद लोगों को बेबस करना है मगर इससे मौतें भी होती हैं। पहली बार 1915 में यह इस्तेमाल हुआ।"

गॉर्डन बताते हैं, "इसके बाद मस्टर्ड गैस आई, जो शरीर पर घाव बना देती है। बाद में नाजियों ने कीटनाशकों से नर्व एजेंट बनाए। इससे उन्होंने कई लोगों को मारा। 1984 से लेकर 1988 तक ईरान-इराक युद्ध मे नर्व एजेंट जमकर इस्तेमाल हुए जो कि नर्वस सिस्टम को ठप कर देते हैं। इराकी कुर्दिस्तान के हलब्जा में तो एक ही दिन में 5000 लोगों की मौत हुई थी।"

रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल आतंक फैलाने के लिए भी किया जाता रहा है। 1995 में जापान के ओम शिनरिक्यो संप्रदाय के सदस्यों ने सरीन नर्व गैस जैसे एक रासायनिक पदार्थ से तोक्यो सबवे सिस्टम पर हमला किया था, जिसमें 13 यात्रियों की मौत हो गई थी, 54 जख्मी हो गए थे। 

रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध के प्रयास

रासायनिक हथियारों के खतरे को समझते हुए साल 1997 में ऑर्गेनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन्स (OPCW) का गठन हुआ था, जिसका काम रासायनिक हथियारों को खत्म करने की दिशा में काम करना है।

यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम करता है। आज 192 देश इसके सदस्य हैं, जिनमें सीरिया भी शामिल है। उसने अपने केमिकल हथियारों की जानकारी सार्वजनिक की थी, उन्हें नष्ट किया गया था और प्रतिबद्धता जताई थी कि वह रासायनिक हथियार न तो तैयार करेगा और न ही इस्तेमाल करेगा। फिर ये हथियार आ कहां से रहे हैं?

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकर मनोज जोशी बताते हैं कि इन हथियारों को छिपाया जा सकता है। वह कहते हैं, "अगर ओपीसीडब्ल्यू को शक होता है कि सदस्य देश के पास केमिकल हथियार हैं तो उसके जांचकर्ता वहं जाकर जांच करते हैं। सीरिया ने पहले इस कन्वेंशन में हस्ताक्षर नहीं किए थे, जबकि ज्यादातर देश 90 के दशक में हस्ताक्षर कर चुके थे।"

जोशी बताते हैं, "2013 में जब गूटा में केमिकल हमला हुआ था तो ओबामा ने धमकी दी थी कि हम सीरिया पर मिसाइल अटैक करेंगे। तब रूस के कहने पर सीरिया ने इस पर साइन किए थे। सीरिया ने 1000 रासायनिक हथियार होने की बात कही थी। माना जाता है कि उसने झूठ बोलकर और भी हथियार छिपाए हैं। केमिकल वेपन्स को छिपाया जा सकता है। अलग-अलग मुल्क, जिन्होंने ओपीसीडब्ल्यू पर हस्ताक्षर किया है, उन्होंने भी हथियार रखे हैं, ऐसा माना जाता है।"

मनोज जोशी कहते हैं, " यह भी कहा जाता है कि सीरिया के छिपाकर रखे गए हथियार ही इस्लामिक स्टेट और अन्य विद्रोही संगठनों के हाथ लग गए, जब उन्होंने विभिन्न इलाकों में कब्जा किया। ऐसा भी शक है कि हाल ही में डूमा में हुआ हमला ऐसे ही किसी संगठन की ओर से सीरिया सरकार को बदनाम करने की कोशिश हो सकता है।"
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क्या होगा सीरिया का?

अगर ओपीसीडब्ल्यू को डूमा में रासायनिक हमले के सबूत मिल जाएँ और ये भी सिद्ध हो जाए कि इसके पीछे सीरिया की सरकार का हाथ था, तो क्या होगा?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मनोज जोशी संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं के बारे में बताते हैं, "अंतरराष्ट्रीय करारों का संबंध संयुक्त राष्ट्र से होता है। ओपीसीडब्ल्यू इस संबंध में यूएन को जानकारी देगा और इस संबंध में कार्रवाई करने का अधिकार उसी को है।"

"यूएन प्रतिबंध लगाने से लेकर सैन्य कार्रवाई तक का निर्णय ले सकता है। मगर सुरक्षा परिषद में रूस और चीन भी हैं। रूस चूंकि सीरिया का सहयोगी है, ऐसे में वह वीटो इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र में ऐसी कोई कार्रवाई न हो पाए।"

परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों को इस्तेमाल न करने को लेकर अलग-अलग करार हैं और कुछ देशों ने इन पर हस्ताक्षर किए हैं तो कुछ ने नहीं। फिर भी दुनिया भर में सहमति है कि युद्ध की स्थिति में इन हथियारों को इस्तेमाल नहीं करना है।

बावजूद इसके विभिन्न देश इन हथियारों को इस्तेमाल करते रहे हैं। जानकार मानते हैं कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल रोकना है तो आपसी सहमति से इनका बहिष्कार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं।
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