Global Economic Crisis: London Stock Exchange
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महंगाई, ऊंची ब्याज दरों, और वित्तीय व्यवस्था पर बढ़ते दबाव के कारण दुनिया भर में गहरा रहा संकट अब विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र माने जाने वाले देशों तक पहुंच गया है। ब्रिटेन के बॉन्ड बाजार में जैसी अफरातफरी पिछले सप्ताह दिखी, उसके बाद अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि ये झटके ब्रिटेन से आगे निकलते हुए दूसरे विकसित देशों तक भी पहुंच सकते हैं।
इस बीच स्विट्जरलैंड के बैंक क्रेडिट सुइसे के दिवालिया होने की लगाई जा रही अटकलों से माहौल और संगीन हो गया है। पश्चिमी मीडिया में कहा गया है कि अगर ये बैंक ढहा, तो उसके उत्तर प्रभाव (चेन रिएक्शन) से 2007-08 जैसी मंदी का सामना दुनिया को करना पड़ सकता है। तब अमेरिकी बैंक लीमैन ब्रदर्स के फेल होने के साथ ही सारी दुनिया आर्थिक मंदी का शिकार हो गई थी।
पिछले हफ्ते ब्रिटिश सरकार ने टैक्स दरों में भारी कटौती की। उसके बाद ब्रिटिश सरकार के बॉन्ड्स और ब्रिटिश मुद्रा पाउंड की कीमतों में तेजी से गिरावट आई। बैंक ऑफ इंग्लैंड (ब्रिटेन के सेंट्रल बैंक) ने तब सरकारी बॉन्ड्स को खरीदने का फैसला कर बॉन्ड बाजार को संभाला। लेकिन बाजार विशेषज्ञों ने कहा है कि यह सिर्फ मरहम है। साथ ही बैंक ऑफ इंग्लैंड के इस कदम से मुद्रास्फीति दर और बढ़ेगी।
ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि अभी आर्थिक संकट की ज्यादा मार ब्रिटेन और यूरोप पर दिख रही है और अमेरिका मोटे तौर पर इससे बचा हुआ है। लेकिन बेकाबू महंगाई के कारण वह भी ज्यादा समय इस संकट के असर से बचा नहीं रह पाएगा। उधर अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि ब्रिटेन अभी आगाह करने वाली चिड़िया की भूमिका निभा रहा है। इससे विकसित देशों को सतर्क हो जाना चाहिए।
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व की ब्याज दर बढ़ाने की नीति से डॉलर मजबूत हुआ है, लेकिन बाकी पूरी दुनिया के मौद्रिक और वित्तीय बाजारों में इससे उथल-पुथल मची हई है। इनमें विकसित देश भी हैं। महंगाई के कारण ब्रिटेन और यूरोपीय देशों ने अपनी जनता को सहायता पहुंचाने की नीति अपनाई है, लेकिन उससे उनका राजकोष दबाव में आया है। इन देशों पर कर्ज का बोझ भी बढ़ रहा है।
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा है- ‘सबसे खतरनाक बात यह है कि ब्रिटेन ऊंची ब्याज दर का शिकार बनने वाला सिर्फ पहला देश है। आगे अन्य देश भी इसका शिकार सकते हैँ। स्थिति कितनी बुरी है? इसकी भविष्यवाणी करना फिलहाल मुश्किल है, क्योंकि बहुत सारे जोखिम छिपे हुए होते हैं। 2007 में ऐसे जोखिम बाद में पता चले।’
अमेरिका के पूर्व वित्त मंत्री और अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर लैरी समर्स ने कहा है कि आज की हालत 2007 में वैश्विक मंदी शुरू होने से ठीक पहले जैसी दिख रही है। उन्होंने कहा है- ‘जब झटके लगते हैं, तो जरूरी नहीं है कि हमेशा गंभीर भूकंप आए। लेकिन बिना झटकों के कभी ऐसे भूकंप नहीं आते। फिलहाल, झटके जरूर महसूस हो रहे हैं।’ अन्य विश्लेषकों ने कहा है कि अब तक संकट उन देशों में गहराया था, जिन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था में परिधि पर माना जाता है। अब यह केंद्र तक पहुंच गया है।