वैज्ञानिकों ने जीन थेरैपी से एक दृष्टिबाधित को आंशिक रोशनी देने में सफलता हासिल की है। अब उसे धुंधला सा दिखाई देने लगा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग में नेत्र चिकित्सक डॉ. जोस एलेन साहेल ने बताया कि ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक का इस्तेमाल कर इस व्यक्ति की एक आंख के रेटिना में प्रकाश पकड़ने वाले प्रोटीनों का निर्माण किया। यह प्रयोग काफी उत्साहजनक रहा। इस शोध को प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर ने प्रकाशित किया है।
क्यों विकसित की ऑप्टोजेनेटिक्स
डॉ. साहेल और उनकी टीम करीब 13 साल से जन्मजात अंधेपन का इलाज ढूंढ रहे हैं। उनका कहना है कि एक बार प्रकाशग्राहक कोशिकाएं मर जाएं तो इनको ठीक नहीं किया जा सकता।
इसलिए ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक विकसित की गई, इसमें दृष्टि से जुड़ी मस्तिष्क की कार्यप्रणाली जांची जाती है। डॉ. साहेल और साथियों ने ऑप्टोजेनेटिक्स के जरिये रेटिना में कोशिकाओं से प्रकाश संवेदी प्रोटीन जोड़ने पर विचार किया।
लेकिन, ऑप्टोजेनेटिक्स प्रोटीन आंखों में जाने वाले प्रकाश से तस्वीर बनाने को लेकर पर्याप्त संवेदनशील नहीं था। लिहाजा, उन्होंने केवल संकेत सूचक प्रकाश (एम्बरलाइट) के प्रति संवेदनशील ऑप्टोजेनेटिक्स प्रोटीन चुना। एम्बरलाइट आंखों के लिए अन्य रंगों के मुकाबले ज्यादा आसान रहती है।
58 वर्षीय दृष्टिबाधित पर प्रयोग
बंदरों में इस जीन थेरैपी का इस्तेमाल करने के बाद डॉ. साहेल और उनकी टीम ने इसे इनसान पर आजमाया। कोरोना के कारण वह सिर्फ एक वॉलंटियर पर ही यह प्रयोग कर सके।
शोध में 58 वर्षीय फ्रांस निवासी को विशेष चश्मे पहनाकर बहुत संकीर्ण क्षेत्र से वस्तुएं दिखाई गई थीं। घर और बाहर सात माह तक ये विशेष चश्मे पहनने के बाद इन्हें एक दिन अचानक जेब्रा क्रॉसिंग की पट्टियां दिखने लगीं।
महामारी खत्म होने के बाद वैज्ञानिक उन्हें प्रयोगशाला लाए और उन्हें इलेक्ट्रॉडयुक्त कैप पहनाई। इस दौरान जब चश्मे ने रेटिना को संकेत भेजे तो इसने दृष्टि में शामिल मस्तिष्क के हिस्सों को भी सक्रिय कर दिया।