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फ्रांस में छात्र आंदोलन: पुलिस की सख्ती पर उठे सवाल, मैक्रों कार्यकाल के आखिरी महीनों में क्यों बढ़ा विवाद?

Fri, 16 Oct 2026 05:18 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, पेरिस।

सार

फ्रांस में स्कूलों की बदहाली और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। पुलिस की सख्ती, हजारों गिरफ्तारियों और किशोरों के गंभीर रूप से घायल होने के बाद विवाद बढ़ गया है। पुलिस की कार्रवाई और तैयारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल के आखिरी महीनों में यह आंदोलन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
 
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फ्रांस में हिंसा - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। कई जगहों पर छात्रों ने स्कूलों के रास्ते बंद किए और मार्च निकाला। कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए। इसके बाद सरकार ने बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया। पिछले कुछ हफ्तों में करीब 8,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि कुछ पुलिसकर्मियों ने भी सरकार के तरीके की आलोचना की है।
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मैक्रों के लिए बढ़ी मुश्किलें?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कार्यकाल मई में खत्म हो रहा है। उनके करीब एक दशक के शासन के आखिरी महीनों में यह आंदोलन नई चुनौती बन गया है। इससे पहले भी कई विरोध प्रदर्शनों के कारण उनकी लोकप्रियता प्रभावित हुई थी। इस बार नाराजगी की बड़ी वजह यह है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में बड़ी संख्या 18 साल से कम उम्र के किशोरों की है। कुछ किशोर पुलिस के हथियारों से गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

बेहतर स्कूल चाहते हैं छात्र
छात्रों की मांग है कि स्कूलों में बेहतर सुविधाएं दी जाएं और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च किया जाए। पेरिस के गरीब इलाकों के अलावा दूसरे शहरों और कस्बों में भी यह मांग उठ रही है। फ्रांस में गरीबी और सरकारी कर्ज बढ़ने के बीच छात्रों की मांग को कुछ लोगों का समर्थन मिल रहा है। वहीं, पुलिस का कहना है कि कुछ लोग प्रदर्शन की आड़ में हिंसा कर रहे हैं। वे पुलिसकर्मियों पर पत्थर और पटाखे फेंक रहे हैं। कई जगह आगजनी और तोड़फोड़ भी हुई है। सरकार के मुताबिक, इन घटनाओं में 900 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 150 से अधिक शिक्षक व स्कूल कर्मचारी घायल हुए हैं। शनिवार को भी अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन होने की योजना है।
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पुलिस की तैयारी पर भी सवाल
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस आंसू गैस, पानी की बौछार और ग्रेनेड जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर रही है। इन हथियारों से लोगों के घायल होने के बाद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।

फ्रांस में पुलिस व्यवस्था पर अध्ययन करने वाले लेखक जीन-मैरी गोडार्ड का कहना है कि हिंसक प्रदर्शनों में ऐसे पुलिसकर्मियों को भेजा जा रहा है, जिन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और जरूरी उपकरण नहीं मिले हैं। पुलिस अधिकारी वालिद हरार ने भी कहा कि कुछ पुलिसकर्मियों की वर्दी आग से बचाव करने वाली नहीं है। कई के हेलमेट पुराने हैं और ढाल भी ठीक नहीं हैं। ऐसे में हिंसक भीड़ का सामना करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।

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पुलिस यूनियन ने सरकार को घेरा
पुलिस यूनियन एलायंस ने सरकार के खिलाफ कानूनी शिकायत दर्ज कराने की घोषणा की है। यूनियन का आरोप है कि पुलिसकर्मियों को साफ निर्देश नहीं दिए जा रहे हैं। कई बार विरोधाभासी आदेश मिलने से वे खतरे में पड़ जाते हैं। यूनियन का कहना है कि पुलिसकर्मियों को हिंसा के बीच असुरक्षित छोड़ दिया गया है।

किशोर का हाथ कटने के बाद हथियार पर रोक
फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के मुताबिक, प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों ने भीड़ को नियंत्रित करने वाले हथियारों का कम से कम 18,000 बार इस्तेमाल किया है। इनमें आंसू गैस और धुआं छोड़ने वाले उपकरण भी शामिल हैं। मंत्री ने बताया कि एक खास ग्रेनेड का करीब 40 बार इस्तेमाल किया गया था। 15 साल के एक किशोर का हाथ कटने के बाद उन्होंने स्कूल के छात्रों के खिलाफ इस हथियार के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। नुनेज का कहना है कि पुलिस हथियारों का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक करती है और नियमों के तहत सिर और गर्दन के ऊपर निशाना लगाने से बचती है।

पुलिस के खिलाफ 36 मामलों की जांच
गृह मंत्री के अनुसार, मंगलवार तक पुलिस के कथित दुर्व्यवहार से जुड़े 36 मामलों की जांच चल रही थी। इनमें चार मामले गंभीर चोटों के कारण अंग खराब होने और छह गंभीर रूप से घायल होने से जुड़े हैं। बाकी मामलों में मारपीट, अपमान और कथित यौन उत्पीड़न के आरोप शामिल हैं। एक पुलिस अधिकारी पर प्रदर्शनकारी को डुबोने की कोशिश करने का आरोप भी है। वहीं, 16 साल के एक किशोर की आंखों की रोशनी आंशिक रूप से जाने के मामले में भी पुलिस अधिकारी पर आरोप लगाया गया है।
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छात्रों और किसानों के प्रदर्शन में फर्क क्यों?
पुलिस विशेषज्ञ सेबेस्टियन रोशे का कहना है कि सरकार किसी आंदोलन को किस नजर से देखती है, उसका असर पुलिस की कार्रवाई पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि फ्रांस में किसानों ने भी सड़कों को जाम किया, सरकारी इमारतों पर खाद डाली और आगजनी की थी। इसके बावजूद छात्रों के मुकाबले किसानों के प्रति पुलिस का रवैया कम सख्त रहा है।

पुलिस अधिकारी हरार के मुताबिक, सोशल मीडिया पर पुलिस की लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की तस्वीरें लगातार सामने आने से लोगों के बीच उसकी छवि खराब हो रही है। उन्होंने कहा कि 2015 में आतंकवादी हमलों के दौरान पुलिसकर्मियों की बहादुरी की तारीफ हुई थी, लेकिन अब प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की तस्वीरें लोगों की सोच बदल रही हैं।
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