फ्रांस में संसदीय चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद जो ट्रेंड उभरा, उससे राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की चिंता बढ़ गई है। इस दौर में वामपंथी गठबंधन को मैक्रों की पार्टी के लगभग बराबर वोट मिले हैं। अब मैक्रों की पार्टी एसेंबल (जिसका पहले नाम ला रिपब्लिक एन मार्श था) की सारी उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि दूसरे दौर में वामपंथी गठबंधन को रोकने के लिए कंजरवेटिव और धुर दक्षिणपंथी मतदाताओं का उसे समर्थन मिलेगा।
पहले दौर के बाद सर्वे एजेंसी इप्सोस ने अंदाजा लगाया है कि नेशनल असेंबली में मैक्रों की पार्टी को 255 से 295 के बीच सीटें मिलेंगी। पूर्ण बहुमत के लिए 289 सीटों की जरूरत है। विश्लेषकों के मुताबिक इस अनुमान के मुताबिक एसेंबल को पूर्ण बहुमत मिलना तय नहीं है। अगर उसे पूरा बहुमत नहीं मिला, तो फिर राजकाज चलाने में मैक्रों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
फ्रांस के टीवी चैनल फ्रांस-24 के एक विश्लेषण में कहा गया है कि पिछले दो दशक में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब राष्ट्रपति की पार्टी को नेशनल असेंबली में साफ बहुमत नहीं मिला हो। लेकिन इस बार ऐसा हो सकता है। पहले चरण के मतदान में एसेंबल को 25.75 फीसदी वोट मिले। जबकि धुर वामपंथी नेता ज्यां लुक मेलेन्शॉं के नेतृत्व वाले न्यू इकोलॉजिकल एंड सोशल पोपुलर यूनियन (एनयूपीईएस) को 25.66 प्रतिशत वोट हासिल हुए। इस पार्टी को 150 से 190 तक सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।
विश्लेषकों के मुताबिक अगर एसेंबल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो मैक्रों को शासन चलाने के लिए लेस रिपब्लिकंस पार्टी और यहां तक कि ली पेन की पार्टी के सांसदों पर निर्भर रहना होगा। यह उनके लिए एक बड़ी समस्या होगी। चुनाव अभियान के दौरान लेस रिपब्लिकंस के नेता क्रिश्चियन जैकॉब ने बार-बार ये कहा है कि उनकी पार्टी एसेंबल का समर्थन नहीं करेगी। इसलिए चुनाव के बाद उनके लिए सौदेबाजी करना कठिन साबित होगा।
पहले चरण में पांच साल पहले की तुलना में लगभग डेढ़ फीसदी कम मतदान हुआ। यह भी अब चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है। कई विश्लेषकों ने इसे लोकतंत्र से मतदाताओं के मोहभंग का संकेत बताया है।