फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी
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फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी पर गैर-कानूनी चुनावी चंदा लेने के आरोप में शुरू हुई सुनवाई ने फ्रेंच राजनीति में जारी भ्रष्टाचार पर एक बार फिर से रोशनी डाली है। सार्कोजी 2007 से 2012 तक राष्ट्रपति थे। उन पर आरोप है कि चुनावी चंदे की तय सीमा से ज्यादा खर्च करने के लिए उन्होंने फर्जी बिलों का सहारा लिया। आरोप है कि ये बिल एक पब्लिक रिलेशन कंपनी से तैयार करवाए गए।
सार्कोजी पर ये मुकदमा शुरू होते ही फ्रेंच मीडिया में फ्रांस की सियासत में जारी भ्रष्टाचार पर गहरी चर्चा शुरू हो गई है। ध्यान दिलाया गया है कि सार्कोजी के पहले राष्ट्रपति रहे जैक शिराक पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हुए थे। इसके अलावा 1995 के बाद अपने पद पर रहे पांच पूर्व प्रधानमंत्रियों पर भ्रष्टाचार के मुकदमे चले, जिनमें तीन को दोषी ठहराया गया। पूर्व प्रधानमंत्री एलन जुपे पर सरकारी धन का गबन करने में जैक शिराक की मदद करने का इल्जाम साबित हुआ था। पिछले साल सार्कोजी के काल में प्रधानमंत्री रहे फ्रांक्वां फिलॉन को गैर-कानूनी ढंग से संसदीय कोष से अपनी पत्नी को तनख्वाह दिलाने के आरोप में सजा सुनाई गई थी।
शिराक, सार्कोजी, जुपे और फिलॉन तीनों दक्षिणपंथी यूएमपी पार्टी के नेता रहे हैं। लेकिन भ्रष्टाचार की जद में सिर्फ इस पार्टी के नेता ही नहीं आए हैं। 1980 के दशक में फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी के कई नेता सार्वजनिक ठेका हड़पने के आरोप में दोषी ठहराए गए थे। फिलहाल, धुर दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी की नेता मेरी ली पेन के खिलाफ यूरोपियन यूनियन के खजाने से 68 लाख यूरो के गबन के आरोप में जांच चल रही है। गौरतलब है कि इस मामले के खुलासे के पहले ली पेन बाकी सभी पार्टियों के नेताओं को भ्रष्ट और सड़ा हुआ फल बताती थीं।
विश्लेषकों का कहना है कि फ्रांस के ज्यादातर राजनेता अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने या अपनी सत्ता को मजबूत करने के रास्ते में किसी नैतिकता की परवाह नहीं करते। ये कहानी दशकों से चल रही है। आधुनिक फ्रांस के संस्थापक माने जाने वाले चार्ल्स द’गॉल पर अफ्रीका में फ्रांस के पूर्व उपनिवेशों के खजाने का इस्तेमाल अपनी पार्टी के लिए करने के आरोप लगे थे। इसी तरह 1969 में राष्ट्रपति बने जॉर्ज पटम्पिदो पर रियल एस्टेट घोटाले में शामिल होने के इल्जाम लगे।
जनमत सर्वे करने वाली एजेंसी ओपिनियन-वे के उपाध्यक्ष ब्रूनो ज्यांबार्ट ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ‘हमारे सर्वेक्षण के मुताबिक फ्रांस के तकरीबन 75 प्रतिशत लोग मानते हैं कि देश की राजनीति भ्रष्ट है। उन्हें इस बात में कोई फर्क महसूस नहीं होता कि किसी नेता ने धनी होने के लिए भ्रष्टाचार किया या गलत ढंग से अपनी पार्टी के लिए पैसा जुटाया।’ लेकिन ज्यांबार्ट ने कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक घोटालों से मतदाताओं की राय ज्यादा प्रभावित नहीं होती। हालांकि विश्लेषकों की राय है कि लगातार सामने आए घोटालों का ही ये नतीजा है कि फ्रांस में पुरानी दक्षिणपंथी और वामपंथी पार्टियों की साख खत्म हो गई है और उनकी जगह धुर दक्षिणपंथी और धुर वामपंथी नेताओं का उदय हुआ है।