एशिया और अफ्रीका के एक बड़े हिस्से में कम अनाज पैदा होने की आशंका गहरा गई है। इसके पीछे एक बड़ा कारण उर्वरकों की तेजी से बढ़ी कीमतें हैं, जिसकी वजह से किसानों के लिए इन्हें हासिल करना कठिन हो गया है। जानकारों ने राय जताई है कि फसल कम होने के कारण दुनिया में पहले खड़ा चुका खाद्य संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
यूक्रेन में रूस के विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू करने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर बेहद सख्त प्रतिबंध लगा दिए। उर्वरकों की महंगाई उसका ही नतीजा है। रूस और बेलारुस पोटेशियम क्लोराइड के प्रमख निर्यातक हैं, जिसका उर्वरक उत्पादन में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा रूस प्राकृतिक गैस का भी प्रमुख सप्लायर है, जिससे यूरोप में ज्यादतर उर्वरक कारखाने चलाए जाते हैं। प्राकृतिक गैस की महंगाई का असर उर्वरक उत्पादन और इनकी कीमत पर पड़ा है। बेलारुस रूस का खास सहयोगी देश है। इसलिए पश्चिमी देशों ने उस पर भी प्रतिबंध लगाए हैं।
गैर-ऑर्गेनिक खादों के उत्पादन में नाईट्रोजन, फॉस्फोरिक एसिड और पोटाशियम क्लोराइड का खास इस्तेमाल होता है। दुनिया भर में पोटेशियम क्लोराइड की जितनी खपत होती है, उसके 40 फीसदी हिस्से की आपूर्ति रूस और बेलारुस करते रहे हैं। विश्व बैंक ने बीते महीने एक रिपोर्ट में बताया कि इन दोनों देशों पर लगे प्रतिबंधों के कारण उर्वरकों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में इस वर्ष 60 से 70 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है।
वेबसाइट निक्कईएशिया ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि विश्व बाजार में आपूर्ति घटने के साथ ही धनी देशों ने उर्वरकों और इनमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की जमाखोरी शुरू कर दी। अमेरिका ने बीते सितंबर में अपने घरेलू उर्वरक बाजार के लिए 50 करोड़ डॉलर की सब्सिडी का एलान किया। इसके पहले अमेरिका ने मार्च में 25 करोड़ डॉलर सब्सिडी का एलान किया था। अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन ने कहा है कि देश के अंदर गैर-ऑर्गेनिक खादों की सप्लाई बनी रहे, इसके लिए वह खास इंतजाम कर रहा है। उधर जापान ने रूस से आपूर्ति रुकने के बाद अब मोरोक्को और कनाडा से उर्वरकों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का आयात शुरू किया है।
लेकिन बहुत से विकासशील देश इस तरह के कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। उन देशों में उर्वरकों की भारी कमी होने की खबर है। इंटरनेशनल फर्टिलाइजेशन एसोसिएशन ने भविष्यवाणी की है कि इस वर्ष दुनिया भर में रसायनिक खादों के इस्तेमाल में सात फीसदी की गिरावट आएगी। इनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल एशिया और अफ्रीका में घटेगा। इसका असर फसलों के उत्पादन पर होगा। एसोसिएशन ने अनुमान लगाया है कि इस वर्ष दुनिया में मक्के की पैदावार में 1.4 फीसदी, धान की पैदावार में 1.5 फीसदी, और गेहूं की पैदावार में 3.1 फीसदी की गिरावट आएगी।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य कार्यक्रम के एशिया और प्रशांत क्षेत्र के निदेशक जॉन अवलिएफ ने कहा है कि पैदावार में गिरावट से खाद्य की जो कमी होगी, वह 2023 तक बनी रहेगी। बाजार विशेषज्ञों ने कहा है कि नए हालात में धनी और गरीब देशों के अनाज उत्पादन में खाई और चौड़ी हो जाएगी। इसका प्रमुख कारण वहां उर्वरकों की अलग-अलग मात्रा में उपलब्धता है।