एक्सप्लेनर: अमेरिका में रखा अपना सोना क्यों निकाल रहे यूरोपीय देश, ये कैसे संकट की आहट; भारत का क्या हाल?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 05 Sep 2026 06:30 PM IST
सार
यूरोपीय देश अमेरिका से अपना सोना क्यों निकाल रहे हैं? ट्रंप की नीतियां, रूस पर प्रतिबंध और डॉलर पर अविश्वास के बीच जानिए भारत ने विदेश में अपना सोना कहां रखा है?
अमेरिका से करीब छह हजार किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर के पार यूरोप में इस वक्त हलचल मची है। इसका शोर अभी तेज नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञ इसे शांत तूफान मान रहे हैं। दरअसल, एक के बाद एक कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका में रखा अपना सोना या तो वापस मंगाना शुरू कर दिया है या इसके लिए कोई और सुरक्षित ठिकाना ढूंढ कर सोने को वहां भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
आइये जानते हैं कि अमेरिका में किन-किन देशों ने ऐतिहासिक तौर पर अपने सोने का भंडारण किया है? अब किन-किन यूरोपीय देशों ने अमेरिका से अपना सोना निकालना शुरू कर दिया है? इसकी वजह क्या है? रूस का मामला कैसे यूरोपीय देशों के लिए एक उदाहरण के तौर पर काम कर रहा है? यूरोप के इस कदम के मायने क्या हो सकते हैं? आइये जानते हैं...
पहले जानें- अमेरिका में किस देश का कितना सोना रखा है?
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अमेरिका से सोना वापस ला रहे यूरोपीय देश।
- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका से करीब छह हजार किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर के पार यूरोप में इस वक्त हलचल मची है। इसका शोर अभी तेज नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञ इसे शांत तूफान मान रहे हैं। दरअसल, एक के बाद एक कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका में रखा अपना सोना या तो वापस मंगाना शुरू कर दिया है या इसके लिए कोई और सुरक्षित ठिकाना ढूंढ कर सोने को वहां भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
आइये जानते हैं कि अमेरिका में किन-किन देशों ने ऐतिहासिक तौर पर अपने सोने का भंडारण किया है? अब किन-किन यूरोपीय देशों ने अमेरिका से अपना सोना निकालना शुरू कर दिया है? इसकी वजह क्या है? रूस का मामला कैसे यूरोपीय देशों के लिए एक उदाहरण के तौर पर काम कर रहा है? यूरोप के इस कदम के मायने क्या हो सकते हैं? आइये जानते हैं...
पहले जानें- अमेरिका में किस देश का कितना सोना रखा है?
अमेरिका में सोना रखने वाले देश।
- फोटो : अमर उजाला
क्यों अमेरिका में अपना सोना रख रहे हैं ये देश?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एक बड़ी महाशक्ति बनकर उभरा। दूसरी तरफ दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक अस्थिरता का दौर बना हुआ था। ऐसे में अमेरिका की स्थिरता के चलते उसके वित्तीय संस्थानों की साख तेजी से बढ़ी और यह सुरक्षा के अहम ठिकानों के तौर पर देखे जाने लगे। यही वजह थी कि उस दौर में न्यूयॉर्क में सोना जमा रखना अपनी सबसे कीमती राष्ट्रीय संपत्ति को युद्ध या किसी बड़े संकट से सुरक्षित रखने का सबसे समझदारी भरा तरीका माना गया। देखते ही देखते कई देशों (खासकर पश्चिमी देशों) ने अपनी सोने के भंडार के एक बड़े हिस्से को सुरक्षा के लिए अमेरिका में रखना शुरू कर दिया।
इसके साथ ही न्यूयॉर्क और लंदन जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्र अपने गहरे व्यापारिक बुनियादी ढांचे और लंबे समय से स्थापित सर्राफा बाजारों के लिए जाने जाते हैं। विदेश में सोना जमा होने से केंद्रीय बैंकों के लिए जरूरत पड़ने पर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार में ट्रेडिंग करना, गोल्ड स्वैप करना और तरलता (लिक्विडिटी) जुटाना बेहद आसान हो जाता है।
अब जानें- किन यूरोपीय देशों ने अमेरिका से सोना निकालना शुरू किया?
1. नीदरलैंड्स
नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक (डीएनबी) ने हाल ही में मार्च और अगस्त 2026 के बीच अमेरिका और कनाडा से अपने 86 टन सोने के भंडार को हटा लिया है। इस बदलाव के बाद, न्यूयॉर्क में रखे डच सोने का हिस्सा 31.3% से घटकर अब केवल 18.5% रह गया है। इस सोने में से लगभग 27 टन सोना वापस नीदरलैंड्स लाया गया और बाकी को लंदन स्थित बैंक ऑफ इंग्लैंड पहुंचाया गया, क्योंकि वहां रखे सोने को संकट के समय ज्यादा तेजी से और आसानी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह पहली बार नहीं है, जब नीदरलैंड्स ने ऐसा कुछ किया है। इससे पहले 2012 में भी उसने अमेरिका से 122.5 टन सोना एम्सटर्डैम वापस ले लिया था और इसकी वजह घरेलू संकट को बताया था।
2. फ्रांस
फ्रांस ने इस साल की शुरुआत में अमेरिका में रखे अपने सोने के भंडारण को खत्म कर लिया। जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच छह महीने के अंदर फ्रांस के सेंट्रल बैंक- बैंक डी फ्रांस ने न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक में जमा अपना पूरा 129 टन सोना बेच दिया। यह उसके कुल स्वर्ण भंडार का करीब पांच फीसदी हिस्सा था। इस सोने को बेचकर जो राशि मिली उससे फ्रांस ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत नया सोना खरीद लिया और इस पर सीधा नियंत्रण हासिल कर लिया।
3. जर्मनी-इटली
अमेरिका से सोना भंडार कम करने के मामले में यूरोपीय देशों में जर्मनी सबसे प्रमुख और पहले देशों में से है। जर्मनी के बुंडेसबैंक 2013 से 2017 के बीच न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक से अपने 300 टन सोने को वापस फ्रैंकफर्ट मंगा लिया था। मौजूदा समय में भी जर्मनी का लगभग 36.6% स्वर्ण भंडार (लगभग 1,236 टन) न्यूयॉर्क स्थित फेडरल रिजर्व में जमा है।
बीते साल यानी 2025 में भी जर्मनी में अमेरिका से सोना वापस मंगाने को लेकर आवाजें बुलंद हुई थीं, लेकिन तब इस कदम को टाल दिया गया था। जर्मनी के साथ-साथ इटली का जो 43 फीसदी सोना इस वक्त अमेरिका में है, उसे निकालने के लिए राजनीतिक तौर पर सरकारों पर दबाव बनाया जा रहा है।
दुनिया में किस देश के पास सोने का कितना भंडार।
- फोटो : अमर उजाला
4. तुर्किये
जर्मनी की तरह ही तुर्किये भी अमेरिका से अपना सोना वापस मंगाने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। उसने साल 2018 में ही अमेरिका के फेडरल रिजर्व से अपने सोने के सभी भंडारों को पूरी तरह से वापस निकाल लिया था।
माना जा रहा है कि नीदरलैंड्स, फ्रांस के हालिया कदमों और जर्मनी-इटली में अमेरिका से सोना निकालने के लिए उठ रही आवाजों के चलते आने वाले समय में यूरोप के अन्य देश भी अमेरिका में रखे अपने सोना भंडार को कम कर सकते हैं।
क्यों अमेरिका से अपना सोना निकालने में जुटे हैं यूरोपीय देश?
ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका पर कम भरोसा
ट्रंप के अजीब सियासी व्यवहार, मित्र देशों पर टैरिफ लगाने की धमकियों और सहयोगियों को लेकर उनके आक्रामक रुख की वजह से यूरोप को सोने के भंडार पर प्रत्यक्ष और पूर्ण भौतिक नियंत्रण की जरूरत महसूस होने लगी है।
यूरोपीय संसद के सदस्य मार्कस फेरबर ने खुले तौर पर चेतावनी दी थी कि ट्रंप काफी अप्रत्याशित हैं और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वे किसी दिन विदेशी स्वर्ण भंडार के प्रबंधन को लेकर कोई भी मनमाना निर्णय ले लें।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यूरोपीय देश नहीं चाहते कि उनका राष्ट्रीय सोना अमेरिका के हाथों में रहकर किसी भू-राजनीतिक सौदेबाजी का जरिया बन जाए, जिसकी वजह से उन्हें भविष्य में इस पर नियंत्रण पाने में मुश्किल हो।
राजनयिक संबंधों में आई कड़वाहट भी वजह
हाल के महीनों में व्यापार नीतियों के अलावा अमेरिका के वैश्विक सैन्य अभियानों, जैसे- ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच राजनयिक मतभेद बहुत बढ़े हैं। दरअसल, फ्रांस ने इस्राइली विमानों को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने से रोक दिया, इटली ने अमेरिकी बमवर्षक विमानों को सिसिली में उतरने की इजाजत नहीं दी और स्पेन ने अमेरिकी सेना को अपने सैन्य ठिकानों और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से रोक दिया। ब्रिटेन ने भी युद्ध में शामिल होने से मना कर दिया।
इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की और यूरोपीय देशों को अमेरिका पर निर्भर बताना शुरू कर दिया। यहां तक कि स्पेन के साथ तो अमेरिका ने अपने राजनयिक और व्यापारिक संबंधों को कम करने तक की धमकी दे दी। इतना ही नहीं समय-समय पर ट्रंप ने खुद ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस पर यह कहकर तंज कसा है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी खर्च नहीं करते और अमेरिका के भरोसे रहते हैं। ट्रंप के इन बयानों और राजनयिक मतभेदों ने यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि वे वॉशिंगटन पर कितना भरोसा कर सकते हैं।
अमेरिका-कनाडा का व्यापार युद्ध
अमेरिका और कनाडा के बीच जारी आयात शुल्क (टैरिफ) की जंग ने भी स्थिति बिगाड़ी है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका के इस कदम ने भी यूरोपीय देशों को डराया है। चूंकि, नीदरलैंड्स जैसे कुछ देशों का सोना कनाडा में भी जमा था, इसलिए डच केंद्रीय बैंक ने नॉर्थ अमेरिका की इस अनिश्चितता से बचने के लिए अपने भंडार को वहां से हटाना सही समझा।
सोना अपने पास रखने के सीधे फायदे
नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक- डीएनबी ने स्पष्ट किया कि जोखिम की स्थितियों में वह अपने सोने के भंडार के स्रोत को बांटना चाहता है, ताकि संकट के वक्त ज्यादा आसानी से वह व्यापार करने के लिए अपने सोने के भंडार का इस्तेमाल कर सके। इसी कदम के तहत उसने अमेरिका से सोना मंगाकर उसका एक बड़ा हिस्सा लंदन भेजा है।
डीएनबी का मानना है कि लंदन के बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखे सोने को संकट के समय में अमेरिका या कनाडा में रखे सोने के मुकाबले ज्यादा तेजी और सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस्तेमाल किया जा सकता है। लंदन वैश्विक स्तर पर सोने के भंडारण और व्यापार का अहम केंद्र है। यहां रखा सोना आधुनिक मानकों के अनुकूल है।
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले साढ़े चार साल से जारी जंग के बीच अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ-साथ ग्रुप ऑफ सेवेन (जी7) देशों ने रूस के संस्थानों और वहां के नागरिकों की अपने यहां रखी गई संपत्ति को जब्त करना शुरू कर दिया।
आंकड़ों की बात करें तो रूस की करीब 300 अरब डॉलर की विदेश में रखी गई संपत्ति फ्रीज हो चुकी है। इन संपत्तियों को वही देश और गठबंधन इस्तेमाल कर रहे हैं या उपयोग करने की बात कर रहे हैं, जिन्होंने इसे जब्त किया।
कुछ देशों ने तो रूस की जब्त संपत्तियों से होने वाले मुनाफे से यूक्रेन को 50 अरब डॉलर की वित्तीय मदद कर्ज पैकेज के तौर पर देने का एलान किया है। यानी एक देश की जब्त संपत्ति, युद्ध में शामिल दूसरे देश को कर्ज देने में इस्तेमाल हो रही है।
इस घटना ने वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों के बीच चिंताजनक उदाहरण पेश किया। कई नीति निर्माताओं को यह आशंका सताने लगी है कि अगर उनका अमेरिका या किसी और देश के साथ मतभेद या सैन्य तनाव होता है, तो विदेशों में रखी उनकी अपनी संपत्ति और स्वर्ण भंडार भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। उन्हें राजनीतिक हथियार के तौर पर जब्त या फ्रीज किया जा सकता है।
देशों में बढ़ रहा विदेश में जमा अपना सोना वापस लाने की प्रवृत्ति।
- फोटो : अमर उजाला
यूरोप के इस कदम के मायने क्या हो सकते हैं, अमेरिका पर क्या होगा असर?
1. 'अपना सोना अपने पास रखने की बढ़ेगी मानसिकता'
मिडिल ईस्ट काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स में सीनियर फेलो फ्रीडरिक श्नाइडर के मुताबिक, दशकों तक विदेश और खास तौर पर अमेरिका में सोना रखना एक सामान्य बात मानी जाती थी, लेकिन अब केंद्रीय बैंकों को लगने लगा है कि अगर उनका सोना या किसी और तरह की संपत्ति देश के बाहर है तो गंभीर संकट के समय उनका पूरा नियंत्रण नहीं रह जाता। अब यूरोपीय देशों का अमेरिका से सोना निकालने के कदम का सबसे बड़ा मतलब यह है कि देश अब अपनी वित्तीय स्वायत्तता को मजबूत करने और अपने सोने पर खुद नियंत्रण रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं।
2. वैश्विक वित्तीय प्रणाली और डॉलर में कम हो रहा भरोसा
अमेरिकी संस्था बुलियन वॉल्ट में रिसर्च के निदेशक एड्रियन ऐश के मुताबिक, अमेरिका अब अपनी मुद्रा- डॉलर को व्यापारिक रिश्तों और वैश्विक भुगतान प्रणालियों से ऊपर रखते हुए विवादों के दौरान राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने लगा है, जिससे कई देश चिंतित हैं। जब अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश ही उस पर भरोसा करने से कतराने लगें, तो यह डॉलर को लेकर वैश्विक विश्वास के लिए एक गंभीर संकेत है।
इस बीच चीन जैसी शक्तियां हॉन्गकॉन्ग और शंघाई को नए सोना भंडारण केंद्रों के रूप में बढ़ावा दे रही हैं, ताकि वे अपनी मुद्रा (युआन) की स्वीकार्यता को बढ़ा सकें और डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम कर सकें।
3. दुनियाभर में सोना रखने के ठिकाने भी बदलेंगे
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की जून में जारी की गई एक रिपोर्ट की मानें तो दुनिया में सोना रखने के ठिकानों का पारंपरिक नक्शा बदल रहा है। अब न्यूयॉर्क और कनाडा जैसी जगहों से सोने को लंदन जैसे सबसे गहरे और आसानी से व्यापार के लायक बाजार में रखा जा रहा है। इसके अलावा एशिया में भी नए स्वर्ण भंडार केंद्र उभर रहे हैं। उदाहरण के लिए, सिंगापुर केंद्रीय बैंक इसी अक्तूबर से विदेशी केंद्रीय बैंकों और संस्थाओं के लिए सोना रखने से जुड़ी सेवाएं शुरू कर रहा है। यह अमेरिका और यूरोप से दूर वित्तीय शक्ति के खड़े होने का संकेत है।
क्या भारत का सोना भी विदेश में मौजूद है?
भारत भी अपने गोल्ड का एक हिस्सा विदेश में रखता है। इनमें ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड प्रमुख हैं। हालांकि, एक छोटा हिस्सा अमेरिका के फेडरल रिजर्व में भी है।
दुनिया में कहां-कहां अपना सोना रखता है भारत।
- फोटो : अमर उजाला
गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2023-24 तक भारत का कुल स्वर्ण भंडार 822 मीट्रिक टन था। इसी वित्तीय वर्ष के दौरान, रिजर्व बैंक ने 100 मीट्रिक टन सोना ब्रिटेन के वॉल्ट्स से निकालकर सुरक्षित रूप से भारत के घरेलू वॉल्ट्स में वापस मंगा लिया। बताया जाता है कि इसकी एक बड़ी वजह रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी संपत्तियां जब्त होने की वजह से उठाया गया था। यह कदम वर्ष 1991 के बाद से देश में सोने के भौतिक हस्तांतरण के सबसे बड़े अभियानों में से एक माना जा रहा है।