फ्रांस में सड़कों पर छात्रों का गुस्सा नजर आ रहा है। कहीं स्कूलों के गेट पर नारे लग रहे हैं तो कहीं पुलिस और छात्रों के बीच टकराव की तस्वीरें सामने आ रही हैं। कुछ शहरों में हालात इतने बिगड़े कि आगजनी और सार्वजनिक परिवहन तक प्रभावित हुआ। इस आंदोलन की शुरुआत पेरिस के आसपास के कुछ हाईस्कूलों से हुई थी। लेकिन कुछ ही दिनों में प्रदर्शन दूसरे शहरों तक पहुंच गया और स्कूलों के भीतर की समस्याएं अब देशभर में चर्चा का विषय बन गई हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि छात्र आखिर क्यों नाराज हैं? उनकी क्या मांगे हैं? प्रदर्शन से कितने लोग प्रभावित हुआ हैं? सरकार का क्या कहना है? इस प्रदर्शन को किन-किन मुद्दों से जोड़ा जा रहा है?
छात्रों की नाराजगी की असली वजह क्या है?
फ्रांस के लाइसी यानी उच्च माध्यमिक स्कूलों में 15 से 18 साल के छात्र पढ़ते हैं। यहां छात्रों की प्रमुख शिकायतें बड़ी कक्षाओं, शिक्षकों की कमी, जर्जर स्कूल भवनों और लंबे पढ़ाई के समय को लेकर हैं। 15 साल की छात्रा केसिया ने रॉयटर्स को बताया कि उसकी कक्षा में 35 छात्र हैं, पर्याप्त कुर्सियां नहीं हैं और एक घंटे का लंच ब्रेक भी सभी छात्रों के लिए पर्याप्त नहीं है।
जून में पड़ी लगातार गर्मी के दौरान भी स्कूलों की खराब हालत सामने आई। कई इमारतों में इन्सुलेशन की व्यवस्था खराब थी और एयर कंडीशनिंग नहीं थी। कई जगह शिक्षक अनुपस्थित थे और उनकी जगह दूसरे शिक्षक नहीं मिले। शिक्षकों में भी काम की परिस्थितियों और वेतन को लेकर असंतोष है।
प्रदर्शन की शुरुआत कहां से हुई?
सितंबर के मध्य में पेरिस के आसपास के लाइसी में छोटे स्तर पर प्रदर्शन शुरू हुए। रॉयटर्स के मुताबिक, आंदोलन करीब 10 दिन पहले पेरिस के उपनगर क्रेतेय के सेंट-एक्जुपेरी हाई स्कूल से शुरू हुआ था।
सोशल मीडिया के जरिए प्रदर्शन तेजी से दूसरे शहरों तक पहुंचा। छात्रों ने स्कूलों के गेट रोकने शुरू किए और कई जगह पुलिस से टकराव हुआ।
फ्रांस के 3,700 लाइसी में से 1,027 स्कूल प्रभावित हुए। विश्वविद्यालय के छात्र भी आंदोलन में शामिल हुए और 30 विश्वविद्यालय परिसरों में नाकाबंदी की गई।
कब बढ़ गया तनाव?
1 अक्तूबर को आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक 1,020 से ज्यादा हाई स्कूल प्रदर्शन या हड़ताल से प्रभावित हुए और 222 जगहों पर नाकाबंदी हुई। 28 सितंबर को ऐसी 180 नाकाबंदी थीं।
कई शहरों में कूड़ेदानों में आग लगाई गई और इन घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। नांत के नेल्सन मंडेला हाई स्कूल के प्रवेश हिस्से में आग लगी। स्ट्रासबर्ग, ऑर्लियॉ, नाइस, ला रोशेल और मार्सेय में सार्वजनिक परिवहन कुछ समय के लिए बंद किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने आपात बैठक के बाद कहा कि आंदोलन स्कूलों की नाकाबंदी से आगे बढ़कर शहरी हिंसा की ओर चला गया।
फ्रांस में छात्रों का प्रदर्शन
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मार्सेय में क्या हुआ?
फ्रांस के दूसरे सबसे बड़े शहर मार्सेय में कई गंभीर घटनाएं हुईं। विक्टर ह्यूगो हाई स्कूल में एक छात्र ने कूड़ेदान में पेट्रोल डालने की कोशिश की, जिसके दौरान दो शिक्षक पेट्रोल की चपेट में आ गए।
सेंट-एक्जुपेरी हाई स्कूल के बाहर सैकड़ों युवाओं ने दमकलकर्मियों को उनका ट्रक छोड़ने पर मजबूर किया और बाद में उसमें आग लगा दी। कर्मचारियों के घायल होने के बाद शहर का सार्वजनिक परिवहन भी रोक दिया गया।
नांत में एक स्कूल में आग लगाई गई और ले हाव्र में दूसरे स्कूल के बाहरी हिस्से को आग से नुकसान पहुंचा। स्ट्रासबर्ग में पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की ओर पटाखे फेंके। टूलूज में पुलिस और युवाओं के बीच झड़प हुई और एक कार में आग लगाए जाने की जानकारी सामने आई। रेनेस में कूड़ेदानों में आग लगाई गई और पेरिस में भी झड़पें हुईं। सेंट-डेनिस में छात्रों की भीड़ पुलिस के सामने जमा हुई।
कितने स्कूल बंद हुए और कितने लोग घायल हुए?
शुक्रवार को करीब 400 हाई स्कूल बंद रहे। शिक्षा मंत्री एडुआर ज्योफ्रे ने कहा कि आंदोलन को बेहद हिंसक समूहों ने अपने कब्जे में ले लिया है। कई स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की गई, खासकर मार्सेय में।
ज्योफ्रे के मुताबिक आंदोलन शुरू होने के बाद कम से कम 65 स्कूल कर्मचारी घायल हुए, जिनमें 40 हाई स्कूल प्रिंसिपल हैं। करीब 170 छात्र घायल हुए और 100 से ज्यादा हाई स्कूलों को गंभीर नुकसान पहुंचा।
कितने लोगों को हिरासत में लिया गया?
1 अक्तूबर को अकेले करीब 1,950 लोगों की गिरफ्तारी हुई। वहीं न्याय मंत्री गेराल्ड दारमानिन ने आरटीएल को बताया कि आंदोलन शुरू होने के बाद करीब 2,000 लोगों को पुलिस हिरासत में लिया गया है। उनके मुताबिक इनमें 90 प्रतिशत नाबालिग हैं। दारमानिन ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले बच्चों के माता-पिता को नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार ठहराने की बात भी कही।
क्या कह रही है फ्रांस की सरकार?
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सरकार ने प्रदर्शन को लेकर क्या कहा?
शिक्षा मंत्री ने अभिभावकों से बच्चों को प्रदर्शन में जाने से रोकने की अपील की और कहा कि सड़क पर बच्चे खतरे में हैं। अगर प्रदर्शनकारी स्कूलों को बंद रखते हैं तो ऑनलाइन कक्षाएं कराने की बात भी कही गई है।
सरकार का कहना है कि स्कूलों की समस्याओं को स्वीकार कर उनका समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन हिंसा के कारण छात्रों का शिक्षा का अधिकार नहीं रोका जा सकता। गृह मंत्री लॉरेंट नूनेज ने आरोप लगाया कि कुछ जगहों पर उपद्रवी एक स्कूल से दूसरे स्कूल जाकर हिंसा भड़का रहे हैं।
तनाव कम करने की कोशिश के तहत शिक्षा मंत्री ज्योफ्रे ने शुक्रवार को कर्मचारी यूनियनों, अभिभावक संगठनों और हाई स्कूल छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की बात कही।
बजट और सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल से इसका क्या संबंध है?
छात्रों का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ जब फ्रांस में सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी भी सरकार के प्रस्तावित बजट के खिलाफ हड़ताल कर रहे थे। इस बजट में 54 अरब यूरो की कटौती और बचत का प्रस्ताव है। सरकार 2027 में सरकारी कर्मचारियों के मूल वेतन को स्थिर रखने का प्रस्ताव दे रही है, जिससे करीब 2 अरब यूरो बचाने का अनुमान है। यूनियनों के मुताबिक यह लगातार चौथा साल होगा जब मूल वेतन में बढ़ोतरी नहीं होगी।
शिक्षक, दमकलकर्मी और दूसरे सरकारी कर्मचारी भी मंगलवार की कार्रवाई में शामिल हुए। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक 11 प्रतिशत से कुछ ज्यादा शिक्षक और स्कूल कर्मचारी हड़ताल में शामिल हुए।
एफएसयू शिक्षा यूनियन की महासचिव कैरोलिन शेव ने कहा कि छात्रों और शिक्षकों की नाराजगी काफी हद तक एक जैसी है। छात्र संगठन के अध्यक्ष रियाद रानी ने भी संसाधनों की कमी, 32 से 35 छात्रों वाली कक्षाओं और शिक्षकों व दूसरे कर्मचारियों की कमी को प्रदर्शन की वजह बताया। उन्होंने देशभर में स्कूलों की नाकाबंदी का आह्वान किया, लेकिन प्रदर्शन शांतिपूर्ण रखने की अपील की।
शिक्षा बजट पर भी सवाल क्यों उठ रहे हैं?
2027 के मसौदा बजट में शिक्षा के लिए 65.53 अरब यूरो का प्रावधान है, जो 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। लेकिन यह महंगाई की दर से कम है और इसमें शिक्षकों की पेंशन शामिल नहीं है। वहीं अगले साल सरकार की कर्ज चुकाने की लागत करीब 74.5 अरब यूरो रहने का अनुमान है।
कुछ छात्रों ने सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए हैं और सरकारी स्कूलों में अबाया पहनने पर लगी पाबंदी का मुद्दा उठाया है। सेंट-डेनिस के मेयर बाली बागायोको ने भी कहा कि गरीब इलाकों को अमीर इलाकों की तुलना में कम संसाधन मिलते हैं।
शिक्षा बजट
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पुलिस की कार्रवाई पर क्यों उठे सवाल?
छात्रों और अधिकार संगठनों ने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। इसमें डंडे, आंसू गैस और गैर-घातक फ्लैश-बॉल गन के इस्तेमाल की शिकायतें शामिल हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पुलिस बल के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरतने की अपील की। गृह मंत्रालय ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस हिंसा से जुड़े तीन मामलों की जांच शुरू की है।
प्रदर्शन के पीछे राजनीति का आरोप क्यों लगा?
फ्रांस की खुफिया एजेंसियों ने सरकार की संकट बैठक में आकलन दिया कि आंदोलन की शुरुआत कट्टर वामपंथी नेताओं ने की। प्रधानमंत्री के करीबी एक व्यक्ति के मुताबिक बैठक में यह आकलन रखा गया कि फ्रांस अनबाउंड यानी एलएफआई और उससे जुड़े कट्टर वामपंथी समूह आंदोलन को संगठित कर रहे हैं। राजनीतिक विरोधियों ने एलएफआई के नेताओं और स्थानीय मेयरों पर प्रदर्शन को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
एलएफआई ने इन आरोपों को खारिज किया। पार्टी सांसद लुई बोयार्ड ने कहा कि एलएफआई शांतिपूर्ण प्रदर्शन का समर्थन करती है और सरकार पर आंदोलन को राजनीतिक लड़ाई में बदलने का आरोप लगाया।
छात्रों का प्रदर्शन
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सरकार और एलएफआई आमने-सामने क्यों हैं?
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने स्कूलों के बाहर हिंसा की निंदा की और राजनीतिक विरोधियों पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया।
एलएफआई नेता ज्यां-ल्यूक मेलांशों ने सरकार पर छात्रों के खिलाफ कार्रवाई का आरोप लगाया और पुलिस की कार्रवाई को नस्लवादी रंग वाला बताया। लेकोर्नू ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि छात्रों के गुस्से का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना गलत है। एलएफआई के वरिष्ठ नेता मैनुअल बोम्पार्ड ने सरकार के आरोपों को साजिश की थ्योरी बताया।
राष्ट्रपति चुनाव से पहले यह मुद्दा क्यों गरम है?
फ्रांस में अगले राष्ट्रपति चुनाव में करीब छह महीने का समय बचा है। रॉयटर्स के मुताबिक अलग-अलग जनमत सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और उनकी केंद्र-दक्षिणपंथी झुकाव वाली सरकार के प्रति लगातार गहरी अलोकप्रियता दिखाई गई है।
इसी समय प्रधानमंत्री लेकोर्नू 2027 के बजट के लिए संसद में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। संसद में राजनीतिक स्थिति बंटी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक छात्रों का प्रदर्शन सार्वजनिक सेवाओं, महंगे ईंधन और परिवारों पर आर्थिक दबाव को लेकर व्यापक नाराजगी के बीच हो रहा है। वहीं फ्रांस से बाहर बेल्जियम के लीएज शहर में भी हाई स्कूल छात्रों ने गुरुवार को प्रदर्शन शुरू किया। शहर प्रशासन के प्रवक्ता के मुताबिक शुक्रवार को वहां हाई स्कूल बंद रहे।
पिछले साल भी हुआ था बड़ा प्रदर्शन
2025 में फ्रांस में सरकार की बजट कटौती की योजना के खिलाफ बड़ा विरोध हुआ था। 15 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू ने 2026 के बजट में सरकारी खर्च घटाने की योजना पेश की। इसके बाद सोशल मीडिया पर 'सब कुछ रोक दो' आंदोलन की तैयारी शुरू हुई और 10 सितंबर 2025 को लोग सरकार की आर्थिक नीतियों के विरोध में सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कीं और कई जगह सार्वजनिक सेवाएं प्रभावित हुईं थी।