फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एक्सप्लेनर: बुर्का बैन के बाद से ही सुलग रही थी गुस्से की आग, फ्रांस का छात्र आंदोलन कैसे बना उग्र प्रदर्शन?

Mon, 19 Oct 2026 05:09 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस

सार

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई, ईंधन की कीमतों और सरकारी सेवाओं के मुद्दों से जुड़कर देशव्यापी विरोध बन गया है। 17 अक्तूबर को करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे और कई जगह हिंसा हुई। लेकिन क्या बुर्का प्रतिबंध ने पहले से मौजूद नाराजगी को बढ़ाया? आखिर छात्रों का आंदोलन राजनीतिक संकट में कैसे बदल गया? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

विज्ञापन
फ्रांस प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

फ्रांस और इटली में हाल के प्रदर्शनों ने यूरोप की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को फिर चर्चा में ला दिया है। शिक्षा व्यवस्था, महंगाई और सरकारी नीतियों के अलावा प्रवासन, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक एकीकरण को लेकर भी बहस जारी है। फ्रांस में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध का कानून 2010 में पारित हुआ था और अप्रैल 2011 से लागू हुआ। वहीं, इटली की सरकार ने सितंबर 2026 में स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ी डिक्री को मंजूरी दी। इन फैसलों ने धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और धर्मनिरपेक्षता को लेकर बहस को तेज किया है।

विज्ञापन




फ्रांस में छात्र आंदोलन की शुरुआत कहां से हुई?
फ्रांस में हाई स्कूल के छात्रों ने सितंबर 2026 से शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर प्रदर्शन शुरू किए। छात्रों की शिकायतों में शिक्षकों की कमी, कक्षाओं में अधिक विद्यार्थियों की संख्या और स्कूलों की खराब हालत शामिल थीं। कई जगह स्कूलों के बाहर विरोध प्रदर्शन और तालाबंदी की घटनाएं हुईं। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, छात्रों का विरोध 21 सितंबर से जारी था। संगठन ने शिक्षकों की कमी, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं और जर्जर स्कूल भवनों को आंदोलन की प्रमुख पृष्ठभूमि बताया है। धीरे-धीरे छात्रों की मांगों को व्यापक सामाजिक असंतोष का समर्थन मिलने लगा। श्रमिक संगठनों और 2018 के येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोगों ने भी विरोध में हिस्सा लिया। इसके बाद प्रदर्शन केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहे, बल्कि महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और आर्थिक नीतियों को लेकर भी नाराजगी सामने आई।
विज्ञापन


बुर्का बैन और सांस्कृतिक तनाव की बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
फ्रांस में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा पूरी तरह ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून 2010 में पारित हुआ था। यह अप्रैल 2011 से लागू हुआ। कानून केवल बुर्के या नकाब का नाम लेकर उन पर रोक नहीं लगाता, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर व्यापक रूप से लागू होता है। इसके कुछ अपवाद भी हैं। इस कानून को लेकर फ्रांस में लंबे समय से बहस होती रही है। इसके समर्थक इसे सार्वजनिक जीवन, सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता से जोड़ते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। फ्रांस में प्रवासन, सामाजिक एकीकरण और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। इसलिए बुर्का बैन का मुद्दा फ्रांस के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसी फैसले से धीरे-धीरे कई लोगों के अंदर आग सुलग रही थी।



इटली में बुर्का बैन को लेकर क्या फैसला हुआ?
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने 24 सितंबर 2026 को स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध और विदेशी विद्यार्थियों से संबंधित नियमों की डिक्री को मंजूरी दी। सरकार ने इसे स्कूलों में बेहतर एकीकरण और विद्यार्थियों को समान अवसर देने की कोशिश बताया। डिक्री में स्कूल परिसर में चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर रोक के साथ उल्लंघन करने पर एक हजार यूरो तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है। इसमें कुछ विद्यार्थियों के लिए कक्षा में 30 प्रतिशत की सीमा भी शामिल है। यह सीमा सभी विदेशी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू नहीं है। इसके लिए नागरिकता, जन्म और इटली में पूर्व स्कूली शिक्षा जैसी शर्तें निर्धारित की गई हैं। भाषा संबंधी प्रावधान भी इस नीति का हिस्सा हैं। इन फैसलों ने इटली में प्रवासन, धार्मिक पहचान और शिक्षा में एकीकरण को लेकर बहस को बढ़ाया है। वहां महंगाई, युद्ध के खिलाफ विरोध और जीवनयापन की लागत जैसे मुद्दे भी प्रदर्शनों में शामिल रहे।

किन-किन देशों बुर्का पर प्रतिबंध?

पूर्ण सार्वजनिक प्रतिबंध इन देशों में सड़कों, बाजारों और सभी सार्वजनिक जगहों पर चेहरा पूरी तरह ढकने पर कानूनी रोक और जुर्माना है

फ्रांस (2010)... यूरोप में सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढकने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश।
बेल्जियम (2011)... सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छिपाने वाले कपड़ों पर पूर्ण रोक।
डेनमार्क (2018)... सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढकने पर जुर्माना। 
ऑस्ट्रिया (2017)... सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे की पहचान छुपाने पर रोक। 
स्विट्जरलैंड (2021 में जनमत संग्रह, 2025 से लागू)... सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध।
बुल्गारिया (2016)... सार्वजनिक स्थलों पर पूरे चेहरे को ढकने पर पाबंदी।   

17 अक्तूबर को फ्रांस में कितने लोग सड़कों पर उतरे?
फ्रांस में 17 अक्तूबर को हुए देशव्यापी प्रदर्शनों में गृह मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार करीब 5.5 लाख लोग शामिल हुए। वहीं, श्रमिक संगठन सीजीटी ने प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग आठ लाख बताई। ये दोनों अलग-अलग स्रोतों के अनुमान हैं, इसलिए इन्हें एक ही आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। प्रदर्शन में छात्रों और शिक्षकों के साथ श्रमिक संगठनों तथा येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोगों ने भी हिस्सा लिया। बड़ी संख्या में लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखीं, लेकिन कुछ स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ हुई। इसी वजह से शिक्षा और आर्थिक नीतियों से शुरू हुआ विरोध कानून-व्यवस्था का भी बड़ा मुद्दा बन गया।

महंगाई और ईंधन की कीमतों ने असंतोष कैसे बढ़ाया?
फ्रांस में जीवनयापन की लागत को लेकर लोगों की नाराजगी आंदोलन के व्यापक संदर्भ का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। ईंधन, आवास, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतों पर होने वाला खर्च परिवारों के बजट को प्रभावित करता है। ऐसे में सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता और शिक्षा व्यवस्था को लेकर शिकायतें भी व्यापक असंतोष से जुड़ गईं। 



फ्रांस के 2027 के बजट में 54 अरब यूरो का क्या मतलब है?

  • फ्रांस की सरकार ने 2027 के बजट के तहत सार्वजनिक घाटा कम करने के लिए कुल 54 अरब यूरो के राजकोषीय सुधार प्रयास का लक्ष्य रखा है। इसमें 43 अरब यूरो के नए उपायों के साथ पहले से तय 11 अरब यूरो के उपाय शामिल हैं। इसलिए पूरे 54 अरब यूरो को केवल नए बजट में खर्च कटौती कहना सही नहीं होगा। सरकार का लक्ष्य सार्वजनिक घाटे को नियंत्रित करना है। 
  • प्रस्तावित उपायों में खर्च पर नियंत्रण और कर संबंधी बदलाव शामिल हैं। इन नीतियों को लेकर श्रमिक संगठनों और सरकारी कर्मचारियों की चिंताएं भी सामने आई हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक सेवाओं और कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। यह बजट विवाद आंदोलन के आर्थिक संदर्भ को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रस्तावित उपायों और पहले से लागू नीतियों के बीच अंतर करना जरूरी है।


येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग क्यों शामिल हुए?
फ्रांस में 2018 में शुरू हुआ येलो वेस्ट आंदोलन ईंधन की कीमतों, जीवनयापन की लागत और आर्थिक असमानता के खिलाफ था। उस आंदोलन ने देश में आर्थिक नीतियों और आम लोगों की क्रय शक्ति को लेकर बड़ी बहस पैदा की थी। अक्तूबर 2026 के प्रदर्शनों में इस आंदोलन से जुड़े लोगों की भागीदारी ने विरोध का दायरा बढ़ाया। छात्रों की शिक्षा संबंधी मांगों के साथ श्रमिकों और दूसरे वर्गों की आर्थिक शिकायतें भी सामने आईं।



फ्रांस में प्रदर्शन हिंसक कैसे हुए?

  • 17 अक्टूबर को फ्रांस के कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। लिमोज में ऐतिहासिक नगर भवन में आग लग गई। मार्सेय में प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने नगर भवन में घुसकर नुकसान पहुंचाया। पेरिस, बोर्डो और लियोन सहित अन्य शहरों में भी तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। कुछ स्थानों पर दुकानों और सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाया गया।
  • पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल थे, जबकि हिंसा में कुछ समूहों की भूमिका सामने आई। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की शिकायतों को हिंसा करने वालों की गतिविधियों से अलग करके देखा जाना चाहिए।


पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियों पर क्या जानकारी है?

  • 17 अक्टूबर की रात प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने शुरुआती जानकारी देते हुए करीब 1,200 गिरफ्तारियों और 150 घायल सुरक्षाकर्मियों का उल्लेख किया था। इसके बाद 18 अक्टूबर को फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने अपडेटेड आंकड़ों में देशभर में करीब 2,400 गिरफ्तारियों और लगभग एक हजार पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी दी। इसलिए इन दोनों आंकड़ों को अलग-अलग समय की रिपोर्ट के रूप में समझना चाहिए।
  • प्रदर्शनों के दौरान कई जगह पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। पुलिस का कहना था कि उसे पथराव और अन्य हमलों का सामना करना पड़ा। वहीं, प्रदर्शनकारियों के एक हिस्से और मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस के बल प्रयोग पर सवाल उठाए। राष्ट्रपति मैक्रों ने हिंसा और तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही, लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को भी स्वीकार किया।

पुलिस की कार्रवाई पर मानवाधिकार के सवाल क्यों उठे?
फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई से कुछ किशोर गंभीर रूप से घायल हुए। ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, एक 15 वर्षीय छात्र का हाथ पुलिस के स्टन ग्रेनेड से गंभीर रूप से घायल हुआ था। वहीं, 14 वर्षीय ईडन के चेहरे पर पुलिस द्वारा दागा गया आंसू गैस का गोला लगने से उसका जबड़ा टूट गया और उसके कई दांतों को नुकसान पहुंचा। इन घटनाओं ने नाबालिगों के खिलाफ बल प्रयोग और पुलिस की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं। संबंधित मामलों की जांच की जानकारी भी सामने आई है।

क्या फ्रांस में राजनीतिक संकट भी आंदोलन की वजह है?
फ्रांस की संसद में 2024 के चुनाव के बाद किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। इससे बजट और सार्वजनिक नीतियों जैसे मुद्दों पर राजनीतिक सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण रहा। ऐसे माहौल में आर्थिक दबाव और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर लोगों की शिकायतें सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता को मौजूदा आंदोलन की एकमात्र वजह नहीं कहा जा सकता। छात्रों की शिक्षा संबंधी शिकायतें, जीवनयापन की लागत और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी समस्याएं भी आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। फ्रांस में अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ऐसे में मौजूदा असंतोष का राजनीतिक असर भी चर्चा का विषय है।

नौ साल पहले यूएई के विदेश मंत्री ने 2017 में क्या चेतावनी दी थी?
संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल-नहयान ने मई 2017 में कट्टरपंथ और आतंकवाद के खतरे पर यूरोप को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि अगर कुछ यूरोपीय देश चरमपंथ से निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाते, तो उन्हें आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले केंद्रों के रूप में पहचाना जा सकता है। उन्होंने राजनीतिक रूप से सही दिखने की कोशिश और फैसले लेने में हिचकिचाहट का भी उल्लेख किया था। फ्रांस और इटली में हाल के प्रदर्शनों के बाद इस बयान का संदर्भ दिया जा सकता है। लेकिन इसे मौजूदा हिंसा की सटीक भविष्यवाणी कहना उचित नहीं होगा। उस समय उनका बयान आतंकवाद और कट्टरपंथ के संदर्भ में था, जबकि मौजूदा प्रदर्शनों में शिक्षा, महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतें भी प्रमुख हैं।

विज्ञापन


इटली में प्रदर्शन क्यों हुए?
इटली में 16 और 17 अक्टूबर के आसपास छात्रों और अन्य समूहों ने सरकार की नीतियों, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, आवास खर्च और सैन्य खर्च जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन किए। मिलान में शनिवार को शांतिपूर्ण मार्च के दौरान कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस पर पत्थर फेंके, दुकानों में तोड़फोड़ की और आग लगाई। पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। शुरुआती रिपोर्टों में करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की जानकारी दी गई। 18 अक्टूबर को मिलान में फिर झड़पें हुईं। पुलिस ने 60 से अधिक लोगों को जांच के लिए थाने ले जाने की जानकारी दी। इससे पहले शनिवार की घटनाओं में 28 गिरफ्तारियां दर्ज की गई थीं। ये अलग-अलग समय की कार्रवाई के आंकड़े हैं। इटली में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध तथा विदेशी विद्यार्थियों से जुड़े नियम भी चर्चा में हैं, लेकिन हालिया प्रदर्शनों की वजहें केवल इन्हीं नीतियों तक सीमित नहीं थीं।

क्या विरोध फ्रांस और इटली से बाहर भी फैला?
यूरोप के अलग-अलग देशों में शिक्षा, महंगाई, आवास और सरकारी नीतियों को लेकर समय-समय पर प्रदर्शन होते रहे हैं। पुर्तगाल में आवास की बढ़ती कीमतें और किराये का संकट लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। बेल्जियम में शिक्षा और सार्वजनिक नीतियों को लेकर विरोध होता रहा है। अल्बानिया में भ्रष्टाचार, रोजगार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर प्रदर्शन हुए हैं। लेकिन हर देश की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए किसी एक साझा यूरोपीय आंदोलन का दावा करने के बजाय प्रत्येक देश के विरोध को उसके स्थानीय संदर्भ में समझना चाहिए। अल्बानिया में भ्रष्टाचार के आरोपों, रोजगार की कमी और सरकारी नीतियों को लेकर विरोध की खबरें सामने आती रही हैं। 



फ्रांस के विपक्ष ने सरकार पर क्या आरोप लगाए?
फ्रांस में विपक्षी दलों ने सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियों की आलोचना की है। वामपंथी दल फ्रांस अनबोव्ड के नेता ज्यां-लुक मेलांशों सरकार की नीतियों और पुलिस की कार्रवाई के आलोचक रहे हैं। ऐसे बयानों को शामिल करते समय उनके मूल कथन और संदर्भ का सत्यापन जरूरी है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार को शिक्षा, सामाजिक असमानता और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों का समाधान करना चाहिए। वहीं, सरकार का जोर हिंसा रोकने और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा पर है। इन दोनों पक्षों को अलग-अलग प्रस्तुत करना जरूरी है।

क्या इस आंदोलन से मरीन ले पेन को राजनीतिक फायदा मिल सकता है?
फ्रांस में हिंसा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ने पर दक्षिणपंथी दल राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। मरीन ले पेन की राजनीति में प्रवासन, सुरक्षा और सख्त कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। ऐसे माहौल में उनके राजनीतिक रुख को अधिक समर्थन मिल सकता है, लेकिन यह केवल एक संभावना है। किसी एक दल को निश्चित रूप से फायदा होने का निष्कर्ष निकालने के लिए चुनावी सर्वेक्षण, जनमत और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण जरूरी होगा। मौजूदा आंदोलन का अंतिम राजनीतिक असर अभी तय नहीं माना जा सकता।



फ्रांस के सामने अब क्या चुनौती है?
फ्रांस की सरकार के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली, हिंसा और तोड़फोड़ पर नियंत्रण करना। दूसरी, शिक्षा, महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों का समाधान करना। छात्रों को बेहतर स्कूल, पर्याप्त शिक्षक और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना आंदोलन की मूल मांगों में शामिल है।बुर्का बैन और धार्मिक पहचान से जुड़े विवाद फ्रांस की व्यापक सामाजिक बहस का हिस्सा हैं। इटली में भी स्कूलों में चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध और विदेशी विद्यार्थियों से संबंधित नियमों ने बहस को तेज किया है। 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें