दूसरे हफ्ते में बढ़ा विरोध, हिंसा ने भी पकड़ी रफ्तार
सितंबर के आखिरी दिनों में प्रदर्शन तेजी से बढ़े। एक अक्तूबर तक फ्रांस में 1,020 से ज्यादा हाईस्कूल हड़ताल या विरोध से प्रभावित हुए। इनमें 222 स्कूलों में नाकेबंदी की गई थी।
कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए। कूड़ेदान जलाने, स्कूल परिसरों को नुकसान पहुंचाने और पुलिस के साथ झड़पों की खबरें सामने आईं। नांत शहर के नेल्सन मंडेला हाईस्कूल के प्रवेश क्षेत्र में आग लगने की घटना भी हुई। कई शहरों में तनाव के कारण सार्वजनिक परिवहन सेवाएं अस्थायी रूप से प्रभावित हुईं।
इस दौरान करीब 1,950 लोगों को गिरफ्तार किया गया। सरकार का कहना था कि कुछ हिंसक समूह छात्रों के विरोध का फायदा उठा रहे हैं।
तीसरे हफ्ते में आंदोलन को मिला भारी समर्थन
अक्तूबर के पहले हफ्ते तक आंदोलन केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहा। विद्यार्थियों के साथ अभिभावक, शिक्षक, श्रमिक संगठन और दूसरे नागरिक भी कई शहरों में सड़कों पर उतरने लगे। प्रदर्शनकारियों की मांगों में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के साथ महंगाई, जीवनयापन का बढ़ता खर्च और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए।
आठ अक्तूबर को देशभर में बड़े प्रदर्शन हुए। उस दिन करीब 71,500 लोग मार्च में शामिल हुए, जिनमें लगभग 24,500 पेरिस में थे। इसके अलावा करीब 55 हजार युवाओं ने स्कूलों के बाहर विरोध गतिविधियों में हिस्सा लिया।
कई जगह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ स्थानों पर झड़पें हुईं। स्कूलों को नुकसान पहुंचाने, शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन को निशाना बनाने व पुलिसकर्मियों के घायल होने की घटनाएं भी सामने आईं। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि उनकी समस्याओं पर ठोस कदम उठाए जाएं।
राजनीतिक खींचतान और आर्थिक संकट ने बढ़ाई नाराजगी
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में विरोध के बीच देश का राजनीतिक और आर्थिक संकट भी चर्चा में है। साल 2024 में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अचानक संसदीय चुनाव कराने का फैसला लिया था। इसके बाद संसद में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला। अलग-अलग दलों के बीच मतभेद के कारण सरकार के लिए बजट जैसे अहम मुद्दों पर सहमति बनाना मुश्किल हो गया। रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला भी लंबे समय से राजनीतिक विरोध का मुद्दा रहा है।
फ्रांस की आर्थिक स्थिति भी सरकार के सामने चुनौती बनी हुई है। 2025 में देश का बजट घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5.1% था, जबकि सरकारी कर्ज जीडीपी के 115.6% तक पहुंच गया। आसान भाषा में कहें तो सरकार की कमाई के मुकाबले उसका खर्च ज्यादा है और इस अंतर को पूरा करने के लिए उसे कर्ज लेना पड़ता है।
सरकार बढ़ते कर्ज को कम करने की कोशिश कर रही है, लेकिन निवेशकों की चिंता बढ़ी है। कई निवेशक फ्रांस के सरकारी बॉन्ड बेच रहे हैं। इससे सरकार के लिए कर्ज लेना महंगा हो गया है और उसे दो दशक से भी ज्यादा समय में सबसे ऊंची उधार लागत का सामना करना पड़ रहा है।
विदेशी कर्जदाता भी अब फ्रांस को पैसा देने में पहले से ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं। जापान के कुछ निवेश फंडों ने फ्रांस को कर्ज देना बंद कर दिया है, जबकि दूसरे कर्जदाता ज्यादा ब्याज मांग रहे हैं। खासकर लंबी अवधि के कर्ज के लिए फ्रांस को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।
17 अक्तूबर को हिंसा ने लिया गंभीर रूप
अक्तूबर के तीसरे हफ्ते में आंदोलन ने और बड़ा रूप ले लिया। 17 अक्तूबर को देशभर में प्रदर्शन हुए। गृह मंत्री लॉरां नुनेज के अनुसार, करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे, जबकि श्रमिक संगठनों ने यह संख्या लगभग आठ लाख बताई।
हालांकि, इस दिन कई प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ शहरों में हिंसक समूहों ने दुकानों और सार्वजनिक इमारतों को निशाना बनाया। लिमोज शहर के नगर भवन में आग लगा दी गई। मार्सेई में प्रदर्शनकारियों ने नगर भवन में घुसकर तोड़फोड़ की और दीवारों पर नारे लिखे। लियोन में शहर के पर्यटन कार्यालय को भी आग के हवाले कर दिया गया।
सरकार के अनुसार, तीन हजार से ज्यादा दुकानों को नुकसान पहुंचा या उन्हें लूटा गया। कई शहरों में कारोबारियों को अपनी दुकानों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने पड़े।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने हिंसा और लूटपाट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही। सरकार ने साफ किया कि वह हिंसा के आगे नहीं झुकेगी।
गृह मंत्री ने की इस्तीफे की पेशकश
17 अक्तूबर की घटनाओं के बाद सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे। कई शहरों में सार्वजनिक इमारतों और दुकानों को नुकसान पहुंचने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा रणनीति की समीक्षा की।
पेरिस, लियोन, लील, बोर्डो और नीस के कुछ इलाकों में आंशिक कर्फ्यू लगाए गए। इनका मकसद खास तौर पर नाबालिगों की आवाजाही सीमित करना और दुकानों व कारोबार को नुकसान से बचाना था। सरकार ने प्रभावित कारोबारियों को आर्थिक सहायता देने का भरोसा भी दिया।
गृह मंत्री लॉरां नुनेज ने सुरक्षा व्यवस्था में चूक स्वीकार करते हुए इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों ने इसे स्वीकार नहीं किया। सरकार ने अगले प्रदर्शनों के लिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का फैसला किया।
इस बीच, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए। सरकार के कुछ नेताओं ने वामपंथी दल ला फ्रांस इंसूमिस पर हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, पार्टी ने हिंसा से खुद को अलग बताया और सरकार पर आंदोलन को बदनाम करने का आरोप लगाया।
फ्रांस की संसद में हुई बहस के बाद प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए संसदीय जांच समिति बनाने की पहल भी हुई।
ट्रंप और मैक्रों के बयान
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
ट्रंप के बयान पर मैक्रों ने जताई नाराजगी
फ्रांस में जारी प्रदर्शनों को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच बयानबाजी भी हुई। ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा को आव्रजन और इस्लाम से जोड़ते हुए दावा किया कि देश में अनियंत्रित आव्रजन के कारण हालात बिगड़ रहे हैं। उन्होंने मैक्रों से आव्रजन पर नियंत्रण करने और सीमाएं बंद करने की अपील की।
21 अक्तूबर को कतर की राजधानी दोहा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मैक्रों ने विदेशी नेताओं की टिप्पणियों पर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि फ्रांस के बारे में गलत जानकारी फैलाई जा रही है और एआई से बनाए गए फर्जी वीडियो के जरिए ऐसी घटनाएं दिखाई गईं, जो वास्तव में हुई ही नहीं थीं।
जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या उनका इशारा ट्रंप की ओर है, तो मैक्रों ने जवाब दिया, उनमें से एक। उन्होंने कहा कि कुछ विदेशी नेता फ्रांस की स्थिति का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों के लिए कर रहे हैं।
फ्रांस की अर्थव्यवस्था
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
एक महीने बाद भी प्रदर्शन जारी, 70 हजार पुलिसकर्मी तैनात
24 अक्तूबर तक फ्रांस में विरोध प्रदर्शन एक महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है। छात्रों की शिक्षा से जुड़ी मांगों से शुरू हुआ आंदोलन अब महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं, सरकारी खर्च और पुलिस की कार्रवाई जैसे मुद्दों से जुड़ गया है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने 24 अक्तूबर को देशभर में 70 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की। यह 17 अक्तूबर के मुकाबले 10 हजार अधिक थी। पुलिस को हिंसा और लूटपाट की आशंका से निपटने के लिए तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। जरूरत पड़ने पर विशेष पुलिस इकाइयों, बख्तरबंद वाहनों और पानी की बौछार करने वाले वाहनों का इस्तेमाल करने की तैयारी भी की गई।
पेरिस में लौवर संग्रहालय, म्यूजे द'ऑर्से, पिकासो संग्रहालय और ओपेरा भवन समेत कई प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान बंद रखे गए। संभावित हिंसा को देखते हुए 20 से ज्यादा मेट्रो स्टेशन भी बंद किए गए। कई शहरों में प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई गईं या उनके मार्ग में बदलाव किया गया।
इसी दौरान पेरिस के पश्चिम में हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार अन्य घायल हुए, जिनमें 12 साल की एक बच्ची भी शामिल थी। शुरुआती रिपोर्टों में इस घटना को संभावित इस्लाम-विरोधी हमला बताया गया।
तोड़फोड़ करने वाले बच्चों के माता-पिता को भरना पड़ सकता है हर्जाना
फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले नाबालिगों के माता-पिता की जिम्मेदारी तय करने का मुद्दा भी चर्चा में है। फ्रांस के नागरिक कानून की धारा 1242 के तहत माता-पिता अपने नाबालिग बच्चों की ओर से किए गए नुकसान के लिए नागरिक रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं। 2025 में कानून में संशोधन कर इस जिम्मेदारी से जुड़े नियमों को मजबूत किया गया था।
अब सरकार हिंसक प्रदर्शनों के दौरान हुई तोड़फोड़ के लिए हर्जाना वसूलने के नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इसके तहत नुकसान की भरपाई के लिए 10 हजार यूरो तक की रकम वसूलने और सामूहिक नागरिक जिम्मेदारी तय करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि कुछ परिस्थितियों में नुकसान पहुंचाने वाले समूह के किसी सदस्य से भी भरपाई मांगी जा सकती है, भले ही उसने खुद सीधे नुकसान न पहुंचाया हो।
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू इस प्रस्ताव के समर्थन में हैं। सरकार का कहना है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का खर्च करदाताओं पर नहीं पड़ना चाहिए। इस पर 27 अक्तूबर को सीनेट में चर्चा का प्रस्ताव है।