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कोरोना वायरस: बस नौ महीनों तक ही कारगर रहेंगी मौजूदा वैक्सीन, नए स्ट्रेन पर होंगी निष्प्रभावी!

Tue, 30 Mar 2021 03:06 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

सर्वे में शामिल 28 देशों के 77 विशेषज्ञों में से लगभग दो तिहाई ने कहा कि मौजूदा वैक्सीन एक साल तक ही प्रभावी रहेंगी। वहीं 88 फीसदी विशेषज्ञों ने कहा कि इन वैक्सीन को बेअसर करने वाले कोविड-19 के नए रूप इतनी तेजी से इसलिए सामने आ रहे हैं, क्योंकि बहुत से देशों में टीकाकरण की दर बहुत कम है...
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कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क पहने महिला - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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मुमकिन है कि कोविड-19 संक्रमण की रोकथाम के लिए अभी तक बनी सभी वैक्सीन एक साल से भी कम समय में बेअसर हो जाएं। तब नए या मौजूदा वैक्सीन के अपडेटेड वर्जन (नए संस्करण) की जरूरत पड़ेगी। ये बात महामारी विशेषज्ञों, संक्रामक रोग विशेषज्ञों और वायरस विशेषज्ञों के बीच कराए गए एक सर्वे से सामने आई है।

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इस सर्वे में शामिल विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि वैज्ञानिक इसीलिए आरंभ से ही पूरी दुनिया में समयबद्ध ढंग से टीकाकरण करने की जरूरत बताते रहे हैं। इस पर जोर देने के पीछे एक वजह उनका ये अंदेशा रहा है कि ये वायरस अपने नए रूप उत्पन्न कर सकता है। विशेषज्ञों ने कहा था कि नए रूप अपेक्षाकृत अधिक संक्रामक और घातक होंगे, जो पुरानी वैक्सीन से काबू में नहीं आएंगे। अब विशेषज्ञों ने कहा है कि ऐसा असल में होने के संकेत मिलने लगे हैं।

सर्वे गैर-सरकारी संगठनों की तरफ से बनाए गए पीपुल्स वैक्सीन अलायंस ने किया। इसे बनाने वाले संगठनों में एमनेस्टी इंटरनेशनल, ऑक्सफेम और यूएनएड्स शामिल हैं। सर्वे में 28 देशों के 77 विशेषज्ञ शामिल हुए। ये विशेषज्ञ जॉन हॉपकिंस और येल यूनिवर्सिटी, इंपीरियल कॉलेज, लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसीन, और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा जैसे संस्थानों से जुड़े हुए हैं। उनमें से लगभग दो तिहाई ने कहा कि मौजूदा वैक्सीन एक साल तक ही प्रभावी रहेंगी। बाकी एक तिहाई विशेषज्ञों ने कहा कि ये वैक्सीन सिर्फ नौ महीनों या उससे भी कम समय तक कारगर रहेंगी।
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सर्वे में शामिल 88 फीसदी विशेषज्ञों ने कहा कि इन वैक्सीन को बेअसर करने वाले कोविड-19 के नए रूप इतनी तेजी से इसलिए सामने आ रहे हैं, क्योंकि बहुत से देशों में टीकाकरण की दर बहुत कम है। ये यूनिवर्सिटी में महामारी विज्ञान के प्रोफेसर ग्रेग गोंजालवेज ने यहां के अखबार द गार्जियन से कहा- ‘(वायरस के) नए संस्करण रोज उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी उन्हें ऐसी परिस्थितियां मिल जाती हैं, जो उन्हें उनके पूर्ववर्ती से अधिक चुस्त बना देती हैं। (वायरस के) नए रूप ज्यादा कुशलता से संक्रमण कर सकते हैं। उनके पिछले स्ट्रेन (रूप) से बचाने के लिए मौजूद मानव शरीर की इम्यून (प्रतिरक्षण) क्षमता को वे आसानी से भेद सकते हैं।’

गोंजालवेज ने कहा- जब तक हम पूरा टीकाकरण नहीं करते, तब तक हमने वायरस के अधिक से अधिक नए रूपों के लिए मैदान खुला छोड़ रखा है। विशेषज्ञों के मुताबिक अभी जिन वैक्सीन का उपयोग हो रहा है, वे पुरानी और नई तकनीक को मिला-जुला कर बनाईं गई हैं। उनके मुताबिक फाइजर/ बायोएनटेक और मॉडेरना कंपनियों ने एमआरएनए तकनीक से वैक्सीन बनाई है। ये वैक्सीन वायरस के नए रूपों से भी बचाव कर सकते है। लेकिन उनके उत्पादन से जुड़ी समस्याएं फिलहाल जग-जाहिर हैं।

जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि इन कंपनियों की वैक्सीन महंगी भी हैं। इसलिए ये गरीब देशों के लोगों तक पहुंच पाएंगी, इसमें शक है। फिर इन्हें रखना भी बहुत महंगा है। इन्हें बेहद निम्न तापमान पर रखना पड़ता है।

फिलहाल टीकाकरण की स्थिति यह है कि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे धनी दशों ने अपनी एक चौथाई आबादी को वैक्सीन का कम से कम एक डोज लगा दिया है। जबकि दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड में अभी एक फीसदी आबादी को भी टीका नहीं लग सका है। कई ऐसे देश हैं, जहां टीकाकरण अभी शुरू ही नहीं हुआ है। टीका मुहैया करने की अंतरराष्ट्रीय पहल के तहत बनी एजेंसी कोवाक्स ने उम्मीद जताई है कि 2021 के अंत तक वह कम आय वाले देशों की 27 फीसदी आबादी तक टीका पहुंचा देगी।

अगर ऐसा हो पाया, तब भी जाहिर है कि दुनिया की आबादी की बहुसंख्या इस साल के अंत तक टीकाकरण से वंचित रहेगी। यानी तब तक कोरोना वायरस को अपने नए रूप उत्पन्न करने और वर्तमान टीकों को बेअसर करने के लिए खुला मैदान मिला रहेगा।

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