चीन से संबंध के मुद्दे पर यूरोपियन यूनियन (ईयू) में फूट पड़ गई है। इस मसले पर ईयू में दो सबसे बड़े देश- जर्मनी और फ्रांस- खुल कर एक दूसरे के सामने आ गए हैं। कड़वाहट इस हद तक बढ़ गई है कि बुधवार को जर्मन चासंलर ओलफ शोल्ज और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच मंत्रिस्तरीय प्रतिनिधिमंडलों के साथ होने वाली बैठक को स्थगित करना पड़ा। इस बैठक की जगह दोनों नेताओं ने फ्रांस के राष्ट्रपति आवास में अनौपचारिक बातचीत की। एक सार्वजनिक बयान में बताया है कि हर साल प्रतिनिधिमंडलों के साथ होने वाली शिखर बैठक अब अगले जनवरी में होगी।
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक शोल्ज की अगले महीने होने वाली चीन यात्रा दोनों देशों के बीच मतभेद का प्रमुख मसला है। शोल्ज की इस यात्रा से न सिर्फ फ्रांस खफा है, बल्कि दूसरे यूरोपीय नेता भी इसको लेकर असंतुष्ट हैं। मैक्रों ने जर्मनी के इऩ्फ्रास्ट्रक्चर में चीन के बढ़ते निवेश पर भी सवाल उठाए हैं। जर्मन सरकार ने कुछ रोज पहले अपने सबसे बड़े बंदरगाह हैम्बर्ग में चीनी कंपनी कोस्को शिपिंग होल्डिंग्स को. के निवेश को हरी झंडी दे दी थी। इस फैसले के बाद बीते शुक्रवार को मैक्रों ने यूरोपीय नेताओं के साथ एक बैठक में कहा- ‘हमने अतीत में भी इन्फ्रास्ट्रक्चर चीन को बेचने की रणनीतिक गलतियां की हैं।’
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था के मंदी में फंसने के बाद अब शोल्ज चीन से संबंध बेहतर करने पर अडिग दिखते हैं। हाल में कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में शी के तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव के बाद शोल्ज बीजिंग जाने वाले पहले पश्चिमी नेता बनना चाहते हैं। अगले महीने होने वाली अपनी चीन यात्रा के दौरान शोल्ज जर्मन कारोबारियों का एक उच्चस्तरीय दल अपने साथ ले जाएंगे। इसके पहले ही कई जर्मन कंपनियां चीन में नया निवेश करने का एलान कर चुकी हैं। कार निर्माता कंपनी बीएमडब्लू ने तो अपने एक प्लांट को ब्रिटेन से हटा कर चीन ले जाने की घोषणा कर दी है।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि चीन और जर्मनी के बीच पहले से मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं। गुजरे वर्षों में चीन पर जर्मनी की निर्भरता बढ़ती चली गई है। इस वर्ष जून में थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ जर्मन इकोनॉमिक्स ने एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा था- ‘चीन का बाजार और वहां होने वाला फौरी मुनाफा बहुत आकर्षक है।’ एक अन्य थिंक टैंक म्युनिख आईएफओ इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनमिक रिसर्च ने अपने एक अध्ययन में कहा है- ‘जर्मनी में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की लगभग आधी कंपनियां चीन से संबंधित सेवाओं पर निर्भर हैं। इन सेवाओं में कल-पुर्जों के आयात से लेकर असेंबलिंग सर्विस तक शामिल हैं।’
जर्मन विश्लेषकों के मुताबिक रूस पर प्रतिबंध लगाना जर्मनी को बहुत महंगा पड़ा है। रूसी ऊर्जा का आयात घटने के कारण जर्मन अर्थव्यवस्था मंदी में चली गई है। इसलिए जर्मन सरकार अब चीन से भी संबंध तोड़ कर अपनी मुसीबत नहीं बढ़ाना चाहती। लेकिन इससे ईयू के दूसरे देश परेशान हैं। अमेरिका भी इससे खफा होगा। इसकी वजह यह है कि चीन को घेरने की पश्चिमी की योजना जर्मन सरकार के रुख से नाकाम हो सकती है।