हॉर्स मीट या घोड़े के गोश्त में घपले के बाद अब ब्रिटेन और यूरोप में मछली घोटाला सामने आया है। मांसाहार के शौकीनों में बड़ी संख्या मछली पसंद करने वालों की भी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार तटवर्ती इलाकों के अलावा अब दूसरे इलाकों में भी मछली और 'सी-फूड' की खपत में तेजी से इजाफा हो रहा है।
मगर ताजा शोध के अनुसार पैकेट के लेबल में जो चीज़ बताई जा रही है, उनमें वह चीज हमेशा नहीं होती।
इस साल की शुरुआत में यूरोप में घोड़े के मांस में घपला हुआ था।
उससे पता चला था कि कैसे आपूर्ति की ताम-झाम भरी प्रक्रिया के कारण प्रोसेस्ड मीट या डब्बाबंद गोश्त पर गलत लेबल लगा दिए गए थे।
महंगी किस्म
बिना आपके जाने महंगी मछलियों के बदले आपके थैले में सस्ती किस्म की मछलियां डाली जा रही हैं।
मसलन ब्रिटेन के राष्ट्रीय पकवान माने जाने वाले मछली और चिप्स को ही लीजिए। इसे ब्रिटेन के खान-पान की परंपरा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।
मगर वैज्ञानिक शोध से यह बात सामने आई है कि मछली की पारंपरिक किस्म 'कॉड' या 'हेडॉक' और चिप्स अक्सर वैसे नहीं होते जैसे पसंद किए जाते हैं।
शोध के अनुसार लागत में कटौती के लिए ब्रिटेन में मछलियों के पैकेट के सात फीसदी हिस्से में सस्ती मछलियां पैक कर दी जाती हैं।
इसी तरह आयरलैंड में स्थित डब्लिन रेस्त्रां, दुकानें और सुपरमार्केट के बारे में पता चला है कि पैक की गईं कॉड या हेडॉक मछलियों के एक चौथाई पैकेटों पर जो लिखा था, पैकेट के भीतर उसकी जगह पर कुछ और माल था।
नई प्रजाति
यही नहीं, अमरीका में किए गए एक शोध के अनुसार न्यूयॉर्क के रेस्त्रां में परोसे जाने वाली मछलियां मेनु में लिखी गई मछलियों की किस्म से अलग होती हैं।
यूरोप भी मछलियों की गलत किस्में परोसे जाने के इस मामले में अछूता नहीं है।
यहां जब मछली उत्पादों को जांचा गया तो इसके लेबल और मैन्यू में लिखी जानकारी गलत पाई गई।
दुनिया भर से आने वाली मछलियों को यूरोपीय संघ के बाजार में दाखिल होने के लिए जांच की प्रक्रिया से गुजरना होता है।
हैम्बर्ग की विशाल यूरोफिन लैबर्टॉरी में पहले सारी मछलियों का परीक्षण किया जाता है।
यूरोफिन लैब्रटॉरी के वैज्ञानिक विकास विभाग के निदेशक डॉक्टर बर्ट पॉपिंग के अनुसार, "इस लेबोरेटरी में मछलियों की ऐसी किस्में आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गईं।"
इंगलैंड के सालफोर्ड विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी डॉ स्टेफानो मरीनी ने इस बारे में एक अध्ययन किया है।
सही लेबल का इस्तेमाल
वह बताते हैं कि ब्रिटेन और आयरलैंड में कॉड मछली की जगह पोलॉक और वितनामीज पैनगेसिस जैसी सस्ती मछलियां दी जा रही हैं।
अब सवाल है कि क्या कारोबारियों के द्वारा किए जाने वाले इस हेर-फेर को रोका जा सकता है?
ब्रिटेन के ‘फिश-एण्ड-चिप’ शॉप के कारोबारी संघ ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ फिश फ्रायर्स’ के उपाध्यक्ष हैं डॉ मार्क ड्रमोंड की दुकान में ग्राहकों का तांता लगा रहता है।
हालांकि वह बहुत सस्ता सामान नहीं बेचते हैं। लेकिन ग्राहकों की भीड़ इस वजह से है क्योंकि ग्राहकों को यकीन है वह सही चीज़ ख़रीद रहे हैं।
उन्होंने दुकान की दीवारों पर एक तस्वीरें चिपका रखी हैं जिनमें बताया गया है कि कौन सी मछली कहां से लाई गई है।
ड्रमोंड के अनुसार मछलियों के वैश्विक कारोबार में कई गड़बड़झाले हैं।
मगर यदि सही लेबल का इस्तेमाल किया जाए तो यह गड़बड़ी काफी हद तक दूर की जा सकती है।