इसी साल जनवरी महीने में व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो के दफ़्तर पर हुए हमले के बाद से ही पेरिस कड़ी सुरक्षा की निगरानी में था। इस हमले में 17 लोग मारे गए थे।
कहा जा रहा है कि चार बंधकों के मारने के बाद पुलिस की गोली का शिकार बने एमेडी काउलिबली आईएस के नाम पर काम कर रहे थे। बीते कुछ साल से पेरिस के साथ ही दूर-दराज़ के कई इलाके इस्लामी चरमपंथियों के लिए मददगार रहे हैं।
इन इलाकों में बेरोज़गारी और शहरी सुख-सुविधाओं के अभाव के कारण मुस्लिम युवक 'जिहाद' की ओर आकर्षित हुए। जानकारों का मानना है कि फ्रांस से 500 से ज़्यादा मुस्लिम लोग जिहादियों के साथ लड़ने के लिए सीरिया और इराक़ तक गए।
किसी भी पश्चिमी देश से लड़ने जाने वालों की यह सबसे बड़ी संख्या है। अमरीका के साथ मिलकर फ़्रांस के लड़ाकू विमानों ने कई बार सीरिया और इराक़ में आईएस चरमपंथियों पर हमला किया।
पेरिस में हुआ हमला सीधे तौर पर बेक़सूर नागरिकों को निशाना बनाकर किया गया। इसका मक़सद अचानक ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जान लेना था। एक हाई-प्रोफ़ाइल फ़ुटबॉल मैच को निशाना बनाना तो समझ में आता है। लेकिन खाना खाने की जगह पर तीन लोगों ने खुद को उड़ा लिया, यह असामान्य बात है।