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फ्रांस के मुसलमान क्यों बाहर कब्र ढूंढते है?

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फ्रांस के कस्बों और शहरों से लेकर अल्जीरिया और मोरक्को के गांवों की तरफ़ एक अजीबोग़रीब पलायन चल रहा है। ये है मृतकों का पलायन।
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हर साल हज़ारों की तादाद में मुसलमानों के शव फ्रांस से मग़रिब (यानी उत्तरी अफ़्रीका के मुस्लिम देशों) को ले जाए जाते हैं। एक कारण तो यह है कि मुसलमान परिवार अपने प्रियजनों को उनके पुश्तैनी इलाक़े की मिट्टी में दफ़नाना चाहते हैं।

दूसरी वजह है- फ्रांस में इस्लामिक रीति से अंतिम संस्कार करने वाले क़ब्रिस्तानों का अभाव।

और तीसरा कारण है कि शवों को अगर तीन या पांच दशक तक एक कब्र में रखना हो तो खासा पैसा खर्च कर कब्र के पट्टे का नवीकरण कराना होता है।

ज़ाहिर है कि शव को बाहर ले जाना एक खर्चीला और जटिल काम है। इसमें नागरिक विमानन सेवा, वाणिज्य दूत प्रशासक और अंतिम संस्कार के विशेषज्ञों की ख़ास भूमिका रहती है।
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ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर उन्हें फ्रांस में ही दफ़न क्यों नहीं किया जाता? फ्रांस ही वह देश है जहां इन परिवारों को रहना है। ऐसे में क्या यह सही नहीं होगा कि मौत के बाद वो चिरविश्राम के लिए फ्रांस को ही चुनें?

जटिल पहचान
बड़े पैमाने पर विस्थापन वाली इस दुनिया में इस सवाल का जवाब राष्ट्रीय पहचान की जटिलताओं से जुड़ा है।

उत्तरी फ्रांस के लिले में एक अंतिम संस्कार पार्लर अल-उवादजिब (अरबी में इसका मतलब है कर्तव्य) के संचालक अब्दुल्ला हदीद से रोज़ाना तीन या चार ऐसे परिवार संपर्क कर रहे हैं, जिनके यहां किसी की मौत हुई है।

उन्होंने बताया कि, “मैं कह सकता हूँ कि क़रीब 70 फ़ीसदी परिवार चाहते हैं कि शव को अल्जीरिया या मोरक्को या कहीं और ले जाया जाए।”

उन्होंने बताया कि, “जब तक शवों के पास प्रार्थना की जाती है और उन्हें कफ़न में रखा जाता है, तब तक हमारा प्रशासनिक दल तेजी से सिटी हॉल, पुलिस, वाणिज्य दूतावास से सभी ज़रूरी दस्तावेज़ पाने की कोशिश करता है। उसके बाद हम परिवार के लिए हवाई यात्रा का टिकट लेते हैं और कफ़न का भुगतान करते हैं। लोगों को इसका एहसास नहीं होगा, पर फ्रांस से उत्तरी अफ्रीका जाने वाली ज़्यादातर उड़ानों में एक से चार शव होते हैं, जो विमान के आकार पर निर्भर करता है। इसमें क़रीब 2500 यूरो (करीब दो लाख रुपए) खर्च आता है।”

बीमा कंपनियों की मदद
उन्होंने बताया कि ज़्यादा से ज़्यादा परिवार बीमा कंपनियों की योजना के तहत हर साल थोड़ी धनराशि जमा करते हैं, ताकि उनके मरने पर इसका इस्तेमाल उनके शव को उनके देश ले जाने में हो सके।

अब्दुल्ला हदीद के मुताबिक अपने प्रियजनों के शवों को मग़रिब भेजने की दो ख़ास वजहें हैं। पहली वजह दिल से जुड़ी है- “पुराने देश” से जुड़ी यादें, वफ़ादारी और वहां जाने की लालसा।

दूसरी वजह व्यावहारिक है- फ्रांस में इस्लामिक रीति से अंतिम संस्कार करने वाले क़ब्रिस्तानों का अभाव।

फ्रांस ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष मानता है। करीब 100 साल से वहां धर्म और राज्य के बीच सख्त अलगाव है। यानी अंतिम संस्कार स्थल पर नगर परिषद आस्था से जुड़े किसी विशेष कर्मकांड से साफ़ मना कर देती है।

पट्टे पर जगह
मुसलमानों के सामने दूसरी समस्या यह है कि फ्रांस के क़ब्रिस्तानों में मिलने वाली जगह स्थायी नहीं है। परिवार 30 या 50 वर्षों के लिए पट्टे पर जगह ले सकते हैं, इसके बाद शवों को आम क़ब्रिस्तान में दफ़ना दिया जाता है।

इससे कई मुसलमान आहत हैं। उनका मानना है कि ज़मीन में दफ़न शव को दोबारा नहीं छूना चाहिए। वे आने वाली पीढ़ियों पर बोझ नहीं बनना चाहते क्योंकि उन्हें फ्रांसीसी क़ब्रिस्तान के पट्टे का नवीनीकरण करना पड़ेगा। इसलिए वे अपने शव मूल देश ले जाना पसंद करते हैं।

अध्यापक करीम सैदी के माता-पिता 1960 में अल्जीरिया से सेंट क्वेंटिन में आकर बसे।

वह बताते हैं, “जब मेरे पिता की एक सड़क दुर्घटना में मौत हुई, तो हमने उनका शव वापस अल्जीरिया भेजने का फ़ैसला किया। हमें अफ़सोस है क्योंकि हम अल्जीरिया की लंबी यात्रा के बगैर क़ब्र तक नहीं जा सकते।”

शिक्षाविद् यासीन शाइबी कहते हैं कि जिस दिन फ्रांस के सभी मुसलमान फ्रांस में ही दफनाए जाने में खुशी महसूस करने लगेंगे, उस दिन उनके फ्रांसीसी जीवन में एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होगी।
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वह आगे कहते हैं, “वह दिन अभी नहीं आया है। यहां मुसलमानों की पहचान अभी कुछ अधूरी सी है। उन्हें पूरी तरह शांति नहीं मिल पाई है। पूर्ण शांति का अर्थ है कि यहां मरने के लिए तैयार रहना, ठीक उसी तरह जैसे वो यहां जीते हैं।”
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