एडम पियर्सन जब भी बाहर निकते हैं, लोग उन्हें घूरने लगते हैं।
लेकिन जब लोगों का घूरना और उनकी फुसफुसाहट बढ़ जाती है, वे थोड़ा डर जाते हैं।
वे एक खास बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसने उनके चेहरे को विकृत कर दिया है।
उन्हें इस बीमारी के साथ रहते हुए सामाजिक रूप से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
लेकिन अब वो विकलांगों के प्रति इंसानों जैसा व्यवहार किए जाने को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
पियर्सन की व्यथा सुनिए उनकी ही जुबानी
लंदन जैसे व्यस्त शहर में, एक विकृत चेहरा लेकर जीने का मतलब है कि मैं किसी की भी आंख से बच नहीं पाता हूँ। यहां तक कि ट्रेन की सामान्य यात्रा भी लोगों के घूरने, इशारे करने या फुसफुसाहट में
तब्दील हो सकती है।
मैं न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप-1 से पीड़ित हूँ। यह ऐसी बीमारी है जिसमें किसी नस का आखिरी हिस्सा नुकसान न पहुंचाने वाले ट्यूमर में बदल जाता है और मेरे मामले में यह चेहरे पर है।
मैं समझ सकता हूं कि लोग क्यों घूरते हैं। हमारे समाज में विकृति को लेकर काफी लापरवाही है। इसमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि लोग यह नहीं जानते कि इस तरह घूरने का क्या मतलब है।
यह घूरना और फुसफुसाहट अपने आप में कोई अपराध नहीं है। हालांकि मुझे रोजाना लोगों के पूर्वाग्रह और गलतफहमियों का सामना करना पड़ता है, फिर भी यह अपराध तो नहीं ही है।
मैं लगातार घूरा जाना पसंद नहीं करता। पर मैं जो महसूस करता हूँ उसे विकलांगता के प्रति नफरत का अपराध नहीं कहा जा सकता। यह इससे भी ज्यादा गंभीर मुद्दा है।
पूर्वाग्रह
जब पीड़ित या कोई अन्य इंसान सोचता है कि उनकी विकलांगता के प्रति पूर्वाग्रह के कारण ऐसा हुआ है तो यह एक अपराध है।
लेकिन जैसे व्यवहार का मैं सामना करता हूँ, अगर इन्हें अनदेखा कर यूं ही छोड़ दिया जाए, तो यह इस तरह के नफरत वाले अपराध का कारण बन सकता है।
इशारे करना और घूरना जल्द ही गाली गलौच में बदल सकता है। रात में जब लोग अकसर शराब के नशे में होते हैं, इसकी संभावना और बढ़ जाती है।
हफ्ते भर की कड़ी महेनत के बाद मैं जब पब में बियर पीने जाता हूँ, काफी डरा हुआ महसूस करता हूं।
लोग शराब पीने के बाद मुझे कई तरह के नामों से बुलाने लगते हैं। मुझे 'मंदबुद्धि,' 'हाथी' और 'विकृत म्यूटैंट' कहा गया। इस तरह के व्यवहार के पीछे चाहे जो मंशा हो, परिभाषा के मुताबिक, यह
विकलांगता के प्रति नफरत का अपराध है।
ऐसी घटनाओं का सामना करने वाला मैं अकेला इंसान नहीं हूं।
नजरअंदाज करने का रुख
मेरे दोस्त ल्यूकस को भी चेहरे की विकृति की परेशानी है। बड़े होते हुए उसका मजाक उड़ाया गया और उस पर छींटाकशी की गई।
हम दोनों के स्कूलों में इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया। उनका रुख कुछ ऐसा लगा- लड़के तो लड़के रहेंगे। शिक्षकों का रुख इसे नजरअंदाज करने वाला था।
ऐसा नजरिया अपनाना खतरनाक है. स्कूल में हम अपने आस पास के लोगों के साथ रहना सीखते हैं। स्कूल में आप जैसा इंसान बनते हैं, उसी से तय हो जाता है कि आप बाकी जिंदगी में कैसे होंगे।
वास्तविक दुनिया में ऐसा करने पर उसे नफरत वाला अपराध माना जाता है। इसलिए इसे स्कूल में सामान्य डराने धमकाने के तौर पर लिया जाए तो इससे ऐसा संदेश जाता है कि यह बचपन की शरारतें
हैं।
मेरी मां को स्कूल के दिनों को गिनने की आदत थी। जब वो कहतीं, अब सात और दिन बचे हैं तो मैं हर सुबह आने वाले दिनों की चिंता के साथ उठता।
मुझे गलत न समझें। मैं किसी भी तरह कमजोर छात्र नहीं था। पर मैं खुद को बहुत अकेला महसूस करता था।
समस्या
हालांकि अब धीरे धीरे जमाना बदल रहा है। पंद्रह साल पहले के मेरे स्कूली दिनों की तुलना में डराने धमकाने की घटना को अब पहले से कहीं अधिक गंभीरता से लिया जाता है।
मैं चेंजिंग फेसेज नाम की एक संस्था के मुखिया के रूप में स्कूलों में जाता हूँ और बच्चों से बात करता हूँ।
मैं लोगों को विकलांगता के बारे में सिखाना चाहता हूँ।
लोग सोच सकते हैं कि मुझे बस थोड़ा रूखा बन जाना चाहिए और अपनी खाल मोटी कर लेनी चाहिए। लेकिन मैं सोचता हूं कि यह नजरिया इस समस्या का हिस्सा है।
जब विकलांगों के खिलाफ नफरत वाला व्यवहार होता है, वह मामूली हो या भयानक, अक्सर इसे अन्य नफरत वाले अपराधों के मुकाबले गंभीरता से नहीं लिया जाता है।
अगर कानूनों को देखा जाए तो यह और साफ हो जाता है।
नफरत वाले अपराधों को रोकने के लिए बने कानून पांच अल्पसंख्यक समूहों को सुरक्षा मुहैया कराते हैं। वे हैं नस्ल, धर्म, सेक्स के लिए साथी चुनने, ट्रांसजेंडर और विकलांगता।
दूसरे कानून भी हैं, जो इन समूहों को सुरक्षा देते हैं। पर विकलांगता को कुछ विशेष नफरत वाले अपराधों से अलग कर दिया गया है।
कानून
विकलांगता के प्रति नफरत वाले अपराध को सामान्य माना जाता है, जबकि नस्ल और धर्म के आधार पर नफरत वाले अपराधों को ज्यादा संगीन माना जाता है।
इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई विकलांग होने की वजह से मुझ पर हमला करता है, तो जज के पास विकल्प होता है कि वो हमलावर की सजा छह महीने तक बढ़ा दे। पर अगर यह हमला नस्ली
कारणों से हुआ हो तो सजा दो साल तक बढ़ाई जा सकती है।
जब मुझे पहली बार यह पता चला तो मैं बहुत निराश हुआ। वह निराशा बरकरार है।
मैं परेशान हूं कि यह कैसी बराबरी है।
साल 2013-14 में इंग्लैंड और वेल्स में पुलिस ने 44,480 नस्ली हमले दर्ज किए। इनमें चार प्रतिशत यानी 1,985 मामले विकलांग के प्रति नफरत से संबंधित थे।
हालांकि कानून में बदलाव मुश्किल है, लेकिन व्यवहार तो आसानी से बदला जा सकता है।
आप लोगों को विकलांगता से परिचित कराकर इसके प्रति उनके व्यवहार को बदल सकते हैं। मैंने हाल ही में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सोशल साइकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर माइल्स ह्यूस्टन के
साथ मिल कर एक प्रयोग किया।
बदलाव की कोशिश
हमने एक परीक्षण किया, जो विकलांगों के प्रति मन में मौजूद पूर्वाग्रह का आकलन करता है।
इसमें पता चला कि बड़ी संख्या में स्वाभाविक पूर्वाग्रह का स्तर बहुत ऊंचा था।
परीक्षण के बाद उन लोगों ने एक घंटे तक मुझसे बात की।
इसके बाद मैंने फिर परीक्षण किया। मैंने पाया कि 10 में से 9 लोगों के नजरिया में बदलाव आया है।
मैं मानता हूँ कि लोगों में बदलाव की बहुत संभावानाएं हैं। पूर्वाग्रह डर से पैदा होता है, इसलिए अगर हम इस ओर लोगों को जागरूक कर सकें और विकलांग लोगों को अधिक से अधिक लोगों से मिलवा
सकें तो इससे आम लोगों में उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।
इस तरह विकलांग लोगों के खिलाफ नफरत के कारण होने वाली आक्रामकता में कमी आएगी।
एक प्रचारक के रूप में, कभी कभी, यह महसूस होता है कि यह समंदर में एक बूंद की तरह है।
लेकिन बिना बूंदों के, कोई समंदर नहीं बनता।