दक्षिण जर्मनी में एक ही सप्ताह के दौरान आम लोगों पर हमले की चार घटनाएं हुईं। इससे ठीक पहले फ्रांस के नीस में एक ट्रक ने 84 लोगों को कुचल दिया था। इन घटनाओं के बाद चरमपंथी हिंसा पर अंकुश लगाने वाले अधिकारी इनके बीच आपसी संबंधों का पता लगा रहे हैं।
ऐसा कोई सूत्र तलाशने की कोशिश हो रही है, जिसकी मदद से इन हमलों को कम करने में मदद मिले। हालांकि इस दिशा में अब तक कोई कामयाबी नहीं मिली है। नीस में जिस शख़्स ने ट्रक से लोगों को कुचला, वह मानसिक समस्याओं से ग्रसित था, हिंसक भी हो जाता था, इसके बावजूद वह अपनी योजना को महीनों तक गोपनीय रखने में कामयाब रहा। उसके हमले की ज़िम्मेदारी कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट ने ली है।
इसी तरह से इस्लामिक स्टेट ने जर्मन ट्रेन में अफ़गानी युवा के कुल्हाड़ी से किए गए हमले और आंसबाख़ में म्यूज़िकल फेस्टिवल के दौरान आत्मघाती हमले की ज़िम्मेदारी भी ली है। पहले ये संदेह किया जा रहा था कि म्यूनिख़ के शॉपिंग मॉल में गोलीबारी की घटना का संबंध भी इस्लामिक स्टेट से हो सकता है लेकिन हमलावर के नज़दीकी लोगों से पता चला कि हमलावर अमरीकी कॉलेज कैंपसों में होने वाली गोलीबारी की घटना से प्रभावित था। इसी तरह से सीरियाई शरणार्थी ने पोलिश महिला की हत्या की थी उसकी वजह भी चरमपंथ नहीं था।
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इन हमलों को अपराध विशेषज्ञ किस तरह से देखते हैं? पीटर आयलवार्ड मेट्रोपोलिटन पुलिस के साथ जासूस के तौर पर काफी समय बिता चुके हैं, उसके बाद वे ब्रॉडमूर साइकेट्रिक हॉस्पिटल में अपराध मनोवैज्ञानिक बने। वे कहते हैं कि इन घटनाओं में कोई कॉमन बात तलाशी जा सकती है।
उन्होंने बताया, “यह मनोवैज्ञानिक समस्या है। नीस और म्यूनिख़ में हमले बताते हैं कि हमला करने वाला डिसऑर्डर का शिकार था। ऐसे लोगों में बदला लेने का भाव था और इस भाव के चलते लोग ज़्यादा ख़तरनाक हमले कर सकते हैं।” लेकिन हम अपने आसपास मानसिक तौर पर बीमार कई लोगों को देखते हैं जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते।
इस पहलू के बारे में आयलवार्ड कहते हैं, “इन हमलावरों के इतिहास पर ध्यान से देखने पर हम देखते हैं कि कई कॉम्बिनेशन बनते हैं जिन्हें अगर सही सीक्वेंस में रखा जाए तो इन हमलों के बारे में पता चल सकता है।” आयलवार्ड के मुताबिक इन हादसों की वजह जानने के लिए अभी और जांच पड़ताल करने की जरूरत है।
कोई शख़्स कैसे बन जाता है आत्मघाती हमलावर?
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यही वजह है कि अमरीका और यूरोप की सरकारें और खुफ़िया एजेंसी के सामने अगले किसी चरमपंथी हमले को रोकने की बड़ी चुनौती है। वे जिन पहलुओं पर विचार करते हैं, उनमें मानसिक स्वास्थ्य का पहलू नहीं होता है।
हाल में वाशिंगटन में पश्चिमी देशों के चरमपंथी निरोधक अधिकारियों की बैठक में इस बात पर चर्चा हुई है कि किस तरह वैचारिक संगठनों, ख़ासकर आईएस जैसे संगठनों के हमलों पर अंकुश लगाया जाए। यह चुनौती तब और भी बड़ी हो जाती है जब किसी मानसिक रोग को कोई चरमपंथी संगठन हमलावर के तौर पर नियुक्त कर ले।
सीआईए और एनएसए के पूर्व निदेशक जनरल माइकल हेडन इस पहलू पर कहते हैं, “एक मुश्किल में पड़ा अकेला व्यक्ति और एक ख़तरनाक व्यक्ति आपस में मिलकर बड़ी कोशिश को अंजाम दे सकते हैं।” मानसिक रोगियों के ज़रिए चरमपंथी संगठन अपना उद्देश्य पूरा करते रहे हैं और यह कोई नयी बात नहीं है। यूरोप में शरणार्थियों के बढ़ते आंदोलन और सीरिया, इराक और अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ते संघर्ष की वजह से यह तरीका फिर से अपनाया जा सकता है। आयलवार्ड इसलिए कहते हैं कि सबसे उपेक्षित तबके को शोषण से बचाना ही इसका उपाय है।