इस घटना के बारे में बात करते हुए फिलिप जरा भी जज्बाती नहीं होते, जबकि इस हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। फिलिप कहते हैं, 'मैं बड़ी आसानी से उस हादसे के बारे में बात कर लेता हूं। मैंने अपनी नियति को मंजूर कर लिया और जिंदगी के सफर में आगे बढ़ चला।'
फिलिप के मुताबिक, तालिबान ने उनका एक पैर जरूर छीन लिया था, मगर फिलिप उन्हें अपनी जिंदगी नहीं छीनने देना चाहते थे। वो कहते हैं, 'अगर मैं अपनी जिंदगी जीना छोड़ देता, तो वो उसे भी छीन लेने में कामयाब हो जाते।' इस दुर्घटना के बाद के कुछ हफ्तों में फिलिप और उनके परिजनों के लिए कई जज्बाती और तकलीफदेह मौके आए।
जब उनके पिता के घर पर दस्तक देकर उन्हें बताया गया कि आपके बेटे ने एक पैर गंवा दिया है। फिर जब फिलिप की बर्मिंघम के क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में अपने पिता से मुलाकात हुई, तो वो बहुत भावुक हो गए थे।
फिलिप कहते हैं, 'कोई भी अपने पिता के सामने रोकर खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहेगा। मैंने बमुश्किल अपने आंसू रोके थे।' लेकिन, हादसे के बाद कई चौंकाने वाले खुशी के पल भी आए। मसलन, जब वो बस में अफगानिस्तान से लौटे और अपने साथियों से मिले।
ये मुलाकात फिलिप के साथ हुए हादसे के महज दो महीने बाद हुई थी। इस दौरान उन्हें बनावटी पैर लगा दिया गया था। फिलिप अब बैसाखी की मदद से खड़े हो पाते थे। उस मुलाकात को याद करते हुए फिलिप कहते हैं, 'वो मुझे देखकर चौंक गए। उन्होंने जब मुझे आखिरी बार देखा था, तो मैं खून से लथपथ जमीन पर पड़ा हुआ था। मेरा एक पैर उड़ गया था।'