इस साल ब्रिटेन प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने की शताब्दी मना रहा है। अब तक दो विश्व युद्ध हो चुके हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या कभी तीसरा विश्व युद्ध भी हो सकता है? मुश्किल सवाल उठाने वाले कार्यक्रम, दि एडिटर्स, के लिए मैंने इस सवाल की पड़ताल करने का फ़ैसला किया।
फ्लैंडर्स और उत्तरी फ़्रांस में युद्धकालीन कब्रिस्तानों में भटकते हुए मेरे दिमाग़ में लगातार उन हज़ारों सैनिकों के ख़्याल आते रहे जो यहां आई छोटी-छोटी प्रलयों में घिर गए होंगे। यहाँ सलीके से लगे हेडस्टोन पर रुडयार्ड किपलिंग की पंक्तियां लिखी हैं।
इन कब्रों की एक के बाद एक कतारें हैं और इनकी अच्छी देखरख की जा रही है। टाइने कॉट प्रथम विश्व युद्ध के ब्रितानी कब्रिस्तानों में सबसे बड़ा है। इसमें 11,000 लोगों के शव हैं। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे भी सैनिक रहे होंगे जो भारी विस्फ़ोटों में उड़ गए होंगे और गायब हो गए होंगे या फिर जिनकी पहचान संभव नहीं रही होगी।
दुर्भाग्यपूर्ण दिवस
प्राचीन बेल्जियम के शहर वाइप्रेस के पास टाइने कॉट की विशाल दीवार के पास मारे गए लोगों के नाम पत्थरों पर अंकित हैं। लेकिन यह विपदा सिर्फ़ इन्हीं लोगों तक सीमित नहीं रही थी। बहुत से जंग से बुरी तरह घायल हुए थे- शारीरिक और मानसिक रूप से।
मेरे खुद के चचेरे परदादा भी उन्हीं लोगों में थे। ईस्ट सरे रेजिमेंट के उनके बहुत से साथी सैनिकों के नाम भी टाइने कॉट में दर्ज हैं।
उनमें से कुछ तो सोमे की जंग के पहले दिन ही मारे गए थे और बाकी ने उसके बाद आने वाले चार ख़ूनी महीनों के दौरान अपनी जान गंवाई।
सिर में लगे बम के टुकड़े ने बदली जिंदगी
मेरे चचेरे परदादा, हैरॉल्ड, जिन्हें जंग के पहले दिन, एक जुलाई, 1916 को सेकेंड लेफ़्टिनेंट से पदोन्नत कर कैप्टन बना दिया गया था, बच गए थे। लेकिन वह पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे। जब वह जंग में शामिल हुए थे वह 25 साल के एक सुंदर, चतुर, प्यारे नौजवान थे, जिनका भविष्य बहुत उम्दा था। लेकिन सिर में बम का एक टुकड़ा लगने से वह घायल हो गए थे, और कभी ठीक नहीं हो सके। उनका पूरा किरदार बदल गया था।
मेरे चचेरे परदादा, हैरॉल्ड एक चिड़चिड़े, हिंसक शराबी में बदल गए थे और उसकी वजह थी बेहद तेज उठने वाले सिरदर्द। उनकी बीवी ने उन्हें तलाक दे दिया और कभी उन पर गर्व करने वाले उनके परिवार ने अपने घर के दरवाज़े उनके लिए बंद कर दिए। क्योंकि वह गुस्से में उनके पास पहुंच जाया करते थे और पैसे मांगते थे।
हैरॉल्ड ने करीब 50 साल तक एक बेघर भिखारी के रूप में वक्त गुज़ारा और अंततः लंदन के वाटरलू स्टेशन की एक बेंच पर उनकी मौत हुई। वह चांदी की घड़ी जो उन्होंने एक जुलाई, 1916 को अपने सैनिकों का नेतृत्व करते वक्त पहनी थी, मौत के वक्त भी उनके हाथ में थी।
एक और विश्व युद्ध!
क्या एक शताब्दी बाद एक और विश्व युद्ध हो सकता है? यह होना संभव नहीं लगता- लेकिन यकीनन जून, 1914 में एक सर्बियाई चरमपंथी के आर्कड्यूक फ्रैंज़ फ़र्डिनैंड और उनकी पत्नी की हत्या से पहले हर जगह लोग यही सोच रहे थे।
यकीनन आज के वक्त में भी ऐसे बहुत से बिंदु हैं जिनसे आग भड़क सकती है। यूरोप और रूस यूक्रेन के मसले पर एक-दूसरे पर गुस्से में टिप्पणियां कर रहे हैं तो चीन और जापान पूर्वी चीन सागर में कुछ वीरान टापुओं के लिए आमने-सामने हैं।
ऐसे वक्त में यह दो ख़ासतौर पर ख़तरनाक मुद्दे हैं। पहली बात तो यह है कि कि छोटे देश बड़ों को इस विवाद में खींच सकते हैं। वर्ष 1914 में रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन सर्बिया की ओर से और जर्मनी ऑस्ट्रिया की ओर से खड़ा हो गया था। दूसरी बात यह कि कई बार सरकारें यह मान बैठती हैं कि वह छोटे पैमाने पर जंग छेड़ सकती हैं जो जल्द ही ख़त्म हो सकती है। सामान्यतः ऐसी सरकारें ग़लत साबित होते हैं।
द ग्रेट इल्यूज़न
हम मानते हैं आज की दुनिया इतनी मजबूती से एक-दूसरे से बंधी हुई है कि एक बड़ी जंग शुरू होनी संभव नहीं लगती। ख़ैर, वर्ष 1910 में नॉर्मन एंगेल नाम के व्यक्ति ने भी बिल्कुल यही सोचा था।
उन्होंने एक किताब लिखी, 'द ग्रेट इल्यूज़न'। यह साबित करने के लिए कि बड़ी शक्तियों के बीच मजबूत व्यापारिक संबंधों के चलते जंग एक पागलपन साबित होगी। किताब तुरंत ही एक बेस्टसेलर बन गई और हालांकि वह बिल्कुल सही थे और 22 साल बाद उन्हें नोबल शांति पुरस्कार भी मिला लेकिन युद्ध तो फिर भी हुआ ही।
फिर भी, पिछले 100 सालों में चीज़ें बहुत ज़्यादा बदली हैं। चाहे जो भी लगे लेकिन हमारी दुनिया पहले के मुकाबले अब कम ख़तरनाक और युद्धरत है। इस वक्त दुनिया में 30 से ज़्यादा जंग जारी हैं लेकिन इनसे इंसानी ज़िंदगी को नुकसान काफ़ी कम है।
युद्ध में मरे लाखों
वर्ष 1950 के मध्य में जब कोरिया युद्ध शुरू हुआ और 2007 में जब इराक़ में मौतों की संख्या कम होनी शुरू हुई, तबसे हर साल जंग से होने वाली मौतों की संख्या करीब 1,48,000 रही। साल 2008 से 2012 तक यह संख्या नाटकीय रूप से गिरकर 28,000 पर आ गई।
2014 में यह और भी कम हो सकती है। चेंगदू, सिचुआन में आपदा राहत अभियान में चीन और रूस अच्छे दोस्त नज़र आए लेकिन प्रशांत महासागर में यह दोनों देश सैन्य-प्रतिद्वंद्वी हैं।
इन आंकड़ों को थोड़ा अलग ढंग से देखें तो पता चलेगा कि 21वीं सद के 14 सालों में युद्ध में हुई मौतों की औसत संख्या हर साल 55,000 है। हालांकि इस पर हमेशा थोड़ा विवाद रहता है कि इराक़ में ब्रिटेन और अमेरिकी हमले से दरअसल कितने लोग मारे गए। मोटे तौर पर यह 90 के दशक की संख्या का आधा थी और शीत युद्ध के दौरान हुई मौतों की एक तिहाई।
भारी क्षति, फिर भी
एक अंतिम और कुछ दिलासा देने वाला निरीक्षण। ब्रिटेन को प्रथम विश्व युद्ध और उसके बाद आए बुखार की महामारी के चलते भारी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन अब अगर 1911 और 1921 के सर्वेक्षणों पर गौर करें तो दिखेगा कि दरअसल इन सालों में ब्रिटेन की जनसंख्या करीब 30 लाख बढ़ी।
लेकिन क्या निकट भविष्य में कोई विश्व युद्ध होने वाला है?
हम नहीं जान सकते, यकीनन, जितना 1910 में नॉर्मन एंगेल जानता था उससे ज़्यादा तो नहीं। लेकिन कम से कम इस बार तो यह सोचना सुरक्षित है कि युद्ध नहीं होगा।