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लंदन के पास बनारस के महाराजा का कुआं

Fri, 04 Jan 2013 03:19 PM IST
बीबीसी हिंदी
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ग्लोबलाइजेशन के दौर में भारत और ब्रिटेन के रिश्तों में मजबूती की काफी बात होती है, खास तौर पर आज जब भारत की तरक्की की तूती बोल रही है। मगर रिश्ते मीठे तब भी थे, जब भारत गुलाम था। लंदन के पास महाराजा का कुआं इसी इतिहास का एक गवाह है।
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लंदन से 60 किलोमीटर दूर, चिल्टर्न पहाड़ियों के पास, स्टोक रो नाम के एक छोटे से गांव में एक कुआं है जिसका नाम है महाराजा का कुआं। इस कुएं को बनारस के महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर ने बनवाया था।

दोस्ती की कहानी
महाराजा के कुएं पर एक किताब 'डिपिन्ग इन्टू द वेल्स' लिखनेवाली एंजेला स्पेन्सर हार्पर कहती हैं कि इस कुएं की कहानी 1857 के सिपाही विद्रोह के समय से शुरू होती है।
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उस समय अंग्रेजों की सेना में एक अफसर थे एडवर्ड एंडरसन रीड और ग़दर को कुचलने में साथ दे रहे थे काशी के नरेश। एडवर्ड और महाराजा साथ लड़े और दोनों की दोस्ती हो गई।

एडवर्ड बाद में सरहदी सूबे के गवर्नर बने और वहां उन्होंने एक बार दो भाइयों की जमीन की लड़ाई सुलझाने के लिए उनकी ज़मीन खरीद पैसा बांटा और उस ज़मीन पर कुआं खुदवा दिया क्योंकि वहां पानी की बेहद कमी थी।

एंजेला बताती हैं कि काशी नरेश ने जब ये सुना तो उन्हें बड़ा अच्छा लगा और उन्होंने कहा मैं भी ऐसा कुछ करना चाहता हूं पर यहां मुश्किल है, काफ़ी भीड़ है यहां, तो मैं तुम्हारे (एडवर्ड) के गांव में कुआं खुदवाउंगा।

दरअसल एडवर्ड ने राजा को बताया था कि उसके गांव में पानी की कितनी कमी है और कैसे गर्मियों में बच्चों की रसोई के लिए रखा पानी पी जाने को लेकर पिटाई तक हो जाती है। और फिर महाराजा ने कुएं के लिए सारी राशि दी और एडवर्ड ने इंग्लैंड लौटकर अपने गांव में कुआं खुदवाया जिसका नाम रखा गया– महाराजा का कुआं।

साफ पानी
कुआं 368 फीट गहरा है यानी कुतुब मीनार से भी अधिक जिसकी ऊंचाई 238 फीट है। कहते हैं कि पानी की बाल्टी खींचकर निकालने में पहले 10 मिनट लग जाया करते थे। और ये सारा का सारा कुआं केवल एक आदमी ने खोद डाला था, हाथों से। कोई साल-सवा साल लगा पूरा कुआं तैयार होने में।

काफी गहरा होने के कारण कुएं का पानी बेहद साफ था। पहले-पहल कुएं में 15-20 फीट पानी हुआ करता था। अभी वहां 50 फ़ीट पानी है। अन्य सुविधाएं सुलभ होने के कारण अब कुएं की जरूरत नहीं रह गई है। पर इसने कोई 70 साल तक गांव के लोगों की प्यास बुझाई। कुएं से पहले वहां लोगों को पोखरों के पानी पर निर्भर रहना पड़ता था।

बनारस से संपर्क
1886 में एडवर्ड एंडरसन रीड की मृत्यु के बाद से स्टोक रो गाँव का बनारस से संपर्क लगभग समाप्त हो गया। दोबारा संपर्क हुआ 72 साल बाद और वो भी संयोग से। 1958 में ऑक्सफ़ोर्ड से एक पर्यटक बनारस गया और तब महाराजा ने उससे कुएं के बारे में पूछा।

ये सुनकर कि कुआं अभी भी है, महाराजा सक्रिय हुए। 1961 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़बेथ बनारस गईं तो महाराजा ने उनसे कुएं की सौवीं वर्षगांठ पर कुछ विशेष करने का अनुरोध किया। महारानी अपने साथ गंगा का पानी ले गईं जिसे कुएं में मिलाया गया।

सौवीं वर्षगांठ पर 1964 में महारानी के पति ड्यूक ऑफ एडिनबरा प्रिंस फिलिप हेलिकॉप्टर से गांव गए और वहां उन्होंने कुएं को देखा। इस दिन कुएं से पानी भी निकाला गया जिसे स्मृति के तौर पर गांव में अभी भी सहेजकर बोतल में रखा गया है। अब 2014 में कुएं की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ पर कुएं के ट्रस्टी वर्तमान महाराजा से संपर्क करना चाहते हैं।

हम उनसे अगले साल कुएं की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के आयोजन के बारे में संपर्क करना चाहते हैं और हमें आशा है कि ये हो पाएगा। ट्रस्ट की सदस्य कैथरीन हेल ने कहा कि हम उनसे कुएं की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के आयोजन के बारे में संपर्क करना चाहते हैं और हमें आशा है कि ये हो पाएगा।

बनारस का कुआं
बीबीसी ने महाराजा के कुएं के संबंध में बनारस के वर्तमान महाराजा अनंत नारायण सिंह से संपर्क किया मगर उन्होंने इस संबंध में कोई रूचि दिखाए बिना केवल इतना कहा कि उनके पूर्वजों ने जो किया, अच्छा किया और इस बारे में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं।

महाराजा ने ये भी नहीं कहा कि उनके पूर्वजों ने इंग्लैंड के कुएं की याद में बनारस में भी ठीक वैसा ही एक कुआं बनवाया है। काशी हिन्दू विश्विविद्यालय के पास ही नगवां इलाके में ये कुआं महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर की पत्नी ने अपने पति की याद में 1891 में बनवाया था।

बीबीसी को इस कुएं की जानकारी दी महाराजा के निजी सचिव डॉ। जयप्रकाश पाठक ने जिन्होंने बताया कि इस कुएं पर लगी पट्टिका पर इंग्लैंड के कुएँ की बात लिखी है। डॉक्टर पाठक ने बताया कि इस पट्टिका पर लगे शिलालेख पर लिखा है कि यह कूप महाराज बनारस द्वारा इंग्लैंड में निर्मित कूप जो महाराजा का कूप के नाम से विख्यात है, उसी का प्रतिरूप है।

बनारस का कुआं अभी भी लोगों के काम आ रहा है। इंग्लैंड के कुएं से अब पानी नहीं निकलता, पर बदलाव का ये मूक साक्षी अभी भी प्यास बुझा रहा है, भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत और रजवाड़ों के रिश्तों को समझना चाहने वालों की।
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