नागासाकी परमाणु हमले के पीड़ित सुमितेरू तानीगुची का 88 साल की उम्र में निधन हो गया है। वह कैंसर से जूझ रहे थे। सुमितेरू की जली हुई पीठ की तस्वीर के बहाने दुनिया ने परमाणु हमले के पीड़ितों का दर्द देखा था।
9 अगस्त 1945 को जब अमेरिका के परमाणु हमले ने जापान के नागासाकी में तबाही मचाई थी तब सुमितेरू 16 साल के थे। बुरी तरह झुलसने के बाद भी सुमितेरू बच गए थे। उनकी पीठ और कोहनियों में परमाणु हमले के निशान जीवित होने तक रहे।
जनवरी 1946 में एक अमेरिकी फोटोग्राफर पीड़ितों का हाल जानने अस्पतालों में भटक रहे थे, तब उन्होंने सुमितेरू की वह तस्वीर खींची थी, जिसमें सुमितेरू पेट के बल लेटे हुए थे और उनकी पीठ जख्मों से लाल थी।
इसी तस्वीर को कई वर्षों तक और आज भी कई दफा नागासाकी के पीड़ितों के दर्द के प्रतीक के तौर पर प्रदर्शित किया जाता है। इस बुधवार को सुमितेरू ने दक्षिणपश्चिम के एक जापानी शहर में आखिरी सांस ली।
बम गिरा तब साइकिल पर थे ...और देखते-देखते सब खत्म हो गया
2015 में सुमितेरू ने अपने साथ हुए वाकये को साझा किया था। उन्होंने बताया कि जिस दिन नागासाकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरे। वह मुख्य जगह से महज 2 किलोमीटर दूर साइकिल पर जा रहे थे। एक जोरदार धमाका हुआ। हर ओर इंद्रधनुष की रोशनी बिखर गई। वह जोरदार तरीके से नीचे गिरे।
होश आया तो बुरी तरह से जख्मी थे। उंगलियों, बायीं बांह की खाल उधड़ चुकी थी। कपड़े फट चुके थे। सुमितेरू ने बताया था कि आसपास कई लाशें तो जल चुकी थीं। जमींदोज बिल्डिंगों से लोग मदद के लिए चीख रहे थे।
दो साल पेट के बल रहे
इलाज के दौरान दो साल तक सुमितेरू पेट के बल ही रहे। डिस्चार्ज होने के बाद उन्होंने नागासाकी के पीड़ितों की मदद से एक ग्रुप बनाया और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज बुलंद की। दो साल पहले उन्होंने कहा था कि वह नहीं चाहते जो दर्द उन्होंने और दूसरे पीड़ितों ने झेला वह और कहीं दोहराया जाए। नागासाकी परमाणु हमले में 74 हजार लोगों की जान गई थी।