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जानिए क्यों दुनिया के लिए इतना जरूरी है दावोस?

Mon, 22 Jan 2018 07:19 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम - फोटो : BBC
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स्विट्जरलैंड को हम उसकी बर्फबारी और खूबसूरत वादियों के लिए जानते हैं। कई हिंदी फिल्मों में इन्हीं वादियों के बीच हीरो-हीरोइन का रोमांस परवान चढ़ता और उतरता रहा है। लेकिन इसी देश के एक छोटे से शहर में दुनिया के बड़े-बड़े सियासी और कारोबारी फैसले परवान चढ़ते हैं।
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इस शहर का नाम है दावोस, जो फिलहाल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे की वजह से चर्चा में है। वो वहां वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम में हिस्सा लेने जा रहे हैं। साल 1997 के बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार यहां जा रहे हैं। इसकी वजह पूछी गई तो मोदी ने कहा, ''दुनिया भली-भांति जानती है कि दावोस अर्थजगत की पंचायत बन गया है।''

दावोस दुनिया के लिए इतना खास क्यों है? क्यों पूरी दुनिया की अर्थनीति वहां से प्रभावित होती है? ऑस्ट्रेलिया से अमरीका तक के दिग्गज नेता यहां क्यों पहुंचते हैं?
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पहले इस शहर के बारे में जान लीजिए। ये प्राटिगाउ जिले में है, वासर नदी के तट पर, स्विस आल्प्स पर्वत की प्लेसूर शृंखला और अल्बूला शृंखला के बीच मौजूद है। समुद्र तल से 5,120 फुट पर स्थित दावोस यूरोप का सबसे ऊंचा शहर कहा जाता है। यह पूर्व अल्पाइन रिजॉर्ट दो हिस्सों से मिलकर बना है। दावोस डॉर्फ (गांव) और दावोस प्लाट्ज। दावोस इसलिए खास है क्योंकि यह वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की मेजबानी करता है।

यहां दुनिया भर के राजनीतिक और कारोबारी दिग्गज साल में एकबार जरूर जुटते हैं और सरल भाषा में इस अहम बैठक को 'दावोस' ही कहा जाता है।

इसके अलावा ये स्विट्जरलैंड का सबसे बड़ा स्की रिजॉर्ट भी है। हर साल के अंत में यहां सालाना स्पेंगलर कप आइस हॉकी टूर्नामेंट आयोजन होता है जिसकी मेजबानी एचसी दावोस लोकल हॉकी टीम करती है। दावोस यूं तो बेहद खूबसूरत है लेकिन उसे दुनिया के नक्शे पर पहचान मिली है वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की वजह से। अब इसके बारे में कुछ जाना जाए। 

कैसे मिली दावोस को पहचान

फोरम की वेबसाइट के मुताबिक उसे दावोस-क्लोस्टर्स की सालाना बैठक के लिए जाना जाता है। बीते कई साल से कारोबारी, सरकारें और सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए यहां जुटते हैं और चुनौतियों से निपटने के लिए समाधानों पर विचार करते हैं।

अब इसके इतिहास पर नजर। प्रोफेसर क्लॉज श्वॉब ने जब इसकी नींव रखी थी तो इसे यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम कहा जाता था। यह फोरम स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर का गैर-लाभकारी फाउंडेशन हुआ करता था।

हर साल जनवरी में इसकी सालाना बैठक होती थी और दुनिया भर के जाने-माने लोग यहां पहुंचते थे। वेबसाइट के मुताबिक शुरुआत में प्रोफेसर श्वाब इन बैठकों में इस बात पर चर्चा करते थे किस तरह यूरोपीय कंपनियां, अमरीकी मैनेजमेंट कंपनियों की कार्यप्रणाली को टक्कर दे सकती हैं। प्रोफेसर श्वाब का विजन 'मील के पत्थर' तक पहुंचने के साथ-साथ बड़ा होता गया और बाद में जाकर वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम में बदल गया।

साल 1973 में ब्रेटन वुड्स फिक्स्ड एक्सेंज रेट मैकेनिज्म का ढहना हो या फिर अरब-इजरायल युद्ध, ऐसी घटनाओं ने इस सालाना बैठक को मैनेजमेंट से आगे ले जाते हुए आर्थिक और सामाजिक मुद्दों तक विस्तार दिया।

नरेंद्र मोदी का दावोस जाना इतनी बड़ी खबर बन रहा है। लेकिन जनवरी 1974 में पहली बार इस बैठक में राजनीतिक नेता शामिल हुए थे। इसके दो साल बाद फोरम ने 'दुनिया की 1000 प्रमुख कंपनियों' के लिए सदस्यता देने का सिस्टम शुरू किया।
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ऐसे मिला अंतरराष्ट्रीय संस्थान का दर्जा

यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम पहला गैर-सरकारी संस्थान है जिसने चीन के इकॉनॉमिक डेवलपमेंट कमिशन के साथ साझेदारी की पहल की। यह वही साल था जब क्षेत्रीय बैठकों को भी जगह दी गई और साल 1979 में 'ग्लोबल कम्पीटीटिव रिपोर्ट' छपने के साथ ही यह नॉलेज हब भी बन गया।

साल 1987 में यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम बना और विजन को बढ़ाते हुए विमर्श के मंच में तब्दील हुआ।

वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की सालाना बैठक के अहम पड़ावों में साल 1988 में दावोस घोषणापत्र पर यूनान और तुर्की के दस्तखत करना शामिल है, जो उस वक्त जंग के मुहाने पर खड़े थे। इसके अगले साल दावोस में उत्तर और दक्षिण कोरिया की पहली मंत्री-स्तर की बैठक हुई थी।

दावोस इसके अलावा भी कई अहम घटनाक्रम देख चुका है। वहां हुई एक बैठक में पूर्वी जर्मनी के प्रधानमंत्री हांस मोडरो और जर्मन चांसलर हेलमुत कोह्ल दोनों जर्मनी के मिलने पर चर्चा के लिए मिले थे।

साल 1992 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति डे क्लर्क ने सालाना मीटिंग ने नेल्सन मंडेला और चीफ मैंगोसुथु बुथलेजी से मुलाकात की। यह दक्षिण अफ्रीका के बाहर उनकी पहली बैठक थी और देश के राजनीतिक बदलाव में मील का पत्थर माना जाता है।

साल 2015 में फोरम को औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय संस्थान का दर्जा मिला। 
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