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क्या भारत में साइबर सेंधमारी हुई?

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साइबर सुरक्षा से जुड़ी एक रूसी फर्म ने कहा है कि इंटरनेट पर उपलब्ध सरकारी सूचना और वैज्ञानिक अनुसंधान से संबंधित जानकारियों की जासूसी पिछले पांच साल से जारी है और भारत भी इस खुफिया सेंधमारी के शिकार देशों में से एक है।
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कम्प्यूटर सुरक्षा से जुड़ी फर्म कैस्परस्काई लैब ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने एक बड़े साइबर हमले का पता लगाया है। लैब ने कहा कि रेड अक्टूबर नाम के इस मालवेयर की पहचान अक्टूबर में ही की गई थी। टॉम क्लैंसी के मशहूर उपन्यास ‘द हंट फॉर द रेड अक्टूबर’ के नाम पर इस जासूसी अभियान को 'रेड अक्टूबर' कहा गया है।

कैस्परस्काई की रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब नियत वाले इस सॉफ्टवेयर (मालवेयर) के जरिये साल 2007 से ही सरकारी संस्थानों से जुड़ी गोपनीय जानकारी की चोरी हो रही है।
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रेड अक्टूबर
रेड अक्टूबर की डिजाइन इस तरह से की गई है कि यह उन फाइलों को भी चुराने में समर्थ है जो कूट रूप से रखे जाते हैं और यहां तक कि मिटा दी गई फाइलें भी पढ़ी जा सकें।

इस साइबर हमले का मुख्य निशाना पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया था, लेकिन दूसरे देश भी इससे प्रभावित हुए हैं। यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि इसके पीछे कौन लोग हो सकते हैं।

लैब ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत और रूस के अलावा कजाख्स्तान, अजरबैजान और बेल्जियम समेत कई दूसरे देशों को इस जासूसी से खासी चोट पहुंची है। दुनिया भर में रेड अक्टूबर की जासूसी की जद में आए विषयों को आठ श्रेणियों में बांटा गया है।

साइबर सेंधमारी
जासूसी का शिकार हुए क्षेत्रों में सरकार, कूटनयिक/दूतावास, अनुसंधान संस्थान, वाणिज्य एवं व्यापार, नाभिकीय/ऊर्जा अनुसंधान, तेल एवं गैस कंपनियां, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और सेना शामिल हैं।

कैस्परस्काई लैब ने कहा है कि शुरुआती सबूतों से पता चलता है कि साइबर जगत की यह खुफिया सेंधमारी साल 2007 से ही चल रही है और जनवरी 2013 में रिपोर्ट लिखे जाने तक यह जारी है।

कैस्परस्काई की रिपोर्ट के मुताबिक रूस 35 बार इस मालवेयर से प्रभावित हुआ है जबकि इसके बाद कजाकिस्तान 21 बार साइबर हमले हुए। अजरबैजान, बेल्जियम और भारत 15 बार इस सॉफ्टवेयर हमले की जद में आए।

लैब ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की तरफ आगाह किया है कि दूसरे क्षेत्र भी इस जासूसी का शिकार हो सकते हैं। मुमकिन है कि अभी तक इन पर नजर नहीं गई हो या वे हमले का शिकार न हुए हों।

कैस्परस्काई ने कहा है कि फिलहाल ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि इनके पीछे किसी देश का हाथ हो। रिपोर्ट के मुताबिक साइबर हमलावरों ने बेहद खास जानकारियां चुराई हैं और इन्हें कहीं भी ऊंची बोली लगाने वाले को बेचा जा सकता है।
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