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कैसे मजे लूटता रहा ट्रेन लुटेरा ब्रिग्स?

Thu, 27 Jun 2013 07:13 PM IST
बीबीसी
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अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन के मामले ने साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण संधियों का जाल कितना जटिल है। आइए जानते हैं क्या हैं इस पूरी व्यवस्था के पेंच।
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दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात लिखित प्रत्यर्पण संधि मिस्र के रामेसेस द्वितीय और पड़ोसी हिटिटेस के बीच 1259 ईसा पूर्व में हुई थी।

कादेश की संधि के नाम से मशहूर इस संधि के तहत दोनों पक्षों को एकदूसरे के अपराधियों और राजनीतिक शरणार्थियों का प्रत्यर्पण करना था।

इस संधि की एक प्रति को कारनैक में सुरक्षित रखा गया है। दूसरे पक्ष की प्रति 1916 में हिटाइट के शाही महल हटोशस से मिली थी। इसकी एक प्रतिलिपि न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की दीवारों की शोभा बढ़ा रही है।

अमेरिका ने पहली प्रत्यर्पण संधि 1794 में ब्रिटेन के साथ की थी। ये पूर्ण संधि नहीं थी बल्कि एक व्यापक संधि का हिस्सा थी।

आधुनिक संधि
इसमें केवल हत्या और जालसाजी जैसे अपराधों का ज़िक्र था। अमेरिका के संघीय आपराधिक कानूनों और अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण के जानकार डगलस मैकनैब के मुताबिक अमेरिका ने पहली आधुनिक संधि 1872 में इक्वाडोर के साथ की थी।
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मैकनैब ने कहा कि पुराने जमाने की प्रत्यर्पण संधियां केवल कुछ अपराधों तक ही सीमित थीं जबकि नए जमाने की संधियों में ऐसे अपराध शामिल हैं जिनमें अधिकतम एक साल की सज़ा का प्रावधान है।

इक्वाडोर, वेनेजुएला और क्यूबा के साथ हुई पुरानी संधियों में हत्या, समुद्री डकैती, विद्रोह, दो शादियां, नकली सामान बनाने और रेल की पटरी तथा पुलों जैसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे अपराध शामिल थे। गर्भपात को बाद में इसमें शामिल किया गया।

मैकनैब के मुताबिक अधिकांश अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण क़ानूनों में ‘राजनीतिक अपराध’ एक अपवाद है। इसके तहत राजनीतिक आरोपी ने जिस देश में शरण ले रखी है वो प्रत्यर्पण से इन्कार कर सकता है।

कार्ल मार्क्स
साल 1870 में बने पहने ब्रितानी प्रत्यर्पण क़ानून के तहत अगर किसी पर राजनीतिक आरोप है तो उसे आत्मसमर्पण करने की ज़रूरत नहीं है। उस समय कार्ल मार्क्स सहित कई शरणार्थी यूरोप से पलायन कर रहे थे और उन्हें ब्रिटेन में शरण दी गई थी।

स्पेन और ब्रिटेन के बीच 100 साल पुरानी संधि 1978 में समाप्त हुई थी लेकिन स्पेन ने इसके नवीनीकरण में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। स्पेन को लगता था कि उसे इससे ज़्यादा फायदा नहीं हुआ क्योंकि ब्रिटेन ने प्रत्यर्पण के कुछ ही आवेदन स्वीकार किए।

लॉ फ़र्म पीटर्स एंड पीटर्स के प्रत्यर्पण मामलों के जानकार आनंद दूबे ने कहा, “स्पेन नागरिक क़ानूनों का इस्तेमाल करता है जबकि ब्रिटेन साझा क़ानूनों का। स्पेन को तब मालूम नहीं था कि प्रत्यर्पण संधि के तहत कैसे सफल आवेदन किया जाता है। ब्रिटेन प्रथम दृष्टया प्रमाण मांगता था।"

शरणस्थली
यही वजह थी दोनों देशों के रिश्ते पटरी पर नहीं आ पा रहे थे। इस दौरान ब्रिटेन का हर अपराधी स्पेन चला गया था। दोनों देशों ने फिर 1985 में एक नए समझौते पर हस्ताक्षर किए।

स्पेन के साथ प्रत्यर्पण संधि के बहाल होने से ब्रिटेन के अपराधियों को दूसरा ठिकाना खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। और उनका नया ठिकाना बना तुर्की के दबदबे वाला उत्तरी साइप्रस। ये देश के सबसे करीब ऐसा इलाक़ा था जिसके साथ ब्रिटेन की प्रत्यर्पण संधि नहीं थी।

साइप्रस से अलग हुए इस क्षेत्र को केवल तुर्की ने मान्यता दी थी। साल 2012 में सीरियस ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एजेंसी ने कहा कि उत्तरी साइप्रस अपराधियों की शरणस्थली बनकर उभर रहा है।

पॉली पैक इंटरनेशनल कंपनी का दिवाला निकालने वाले आसिल नादिर ब्रिटेन से भागने के बाद 17 साल उत्तरी साइप्रस में ही रहे। हालांकि अब वहां की सरकार अपराधियों को पकड़वाने में ब्रितानी पुलिस के साथ सहयोग कर रही है।

ब्रिग्स
दुबई भी ब्रिटेन के अपराधियों के लिए शरणस्थली बन गई थी। लेकिन ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात ने 2008 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर करके इस समस्या को दूर कर लिया।

ब्रिटेन और ब्राज़ील के बीच 1990 के दशक से पहले तक कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं थी। यही वजह थी कि ट्रेन लुटेरे रॉनी ब्रिग्स 1965 में वेंड्सवर्थ जेल से भागने के बाद दशकों तक रियो के समुद्री तटों पर धूप का मज़ा उठाते रहे। दोनों देशों के बीच अगर प्रत्यर्पण संधि भी होती तब भी ब्राज़ील के क़ानून के मुताबिक देश के किसी बच्चे के पिता का प्रत्यर्पण नहीं किया जा सकता।

ब्राज़ील में एक सिक्योरिटी फ़र्म में काम करने वाले ब्रिटेन के कुछ पूर्व सैनिकों ने 1981 में ब्रिग्स का अपहरण कर लिया और उन्हें बहामास ले आए। माना जा रहा था कि बहामास से ब्रिग्स को आसानी से ब्रिटेन भेजा जा सकेगा लेकिन देश के हाई कोर्ट ने ब्रिग्स को वापस ब्राज़ील भेजने का आदेश दिया।

साल 1997 में आखिर ब्रिटेन और ब्राज़ील के बीच प्रत्यर्पण संधि हुई लेकिन ब्राज़ील ने फिर भी ब्रिग्स को ब्रिटेन भेजने से इन्कार कर दिया। उसका तर्क था कि ब्रिग्स के अपराध को दो दशक से अधिक समय हो गया है।

बंदोबस्त
कई देश अपने नागरिकों के मुकदमे का सामना करने के लिए दूसरे देश नहीं भेजते हैं। कुछ देशों ने बाकायदा अपने संविधान में इसका बंदोबस्त कर रखा है। उदाहरण के लिए रूस ने संविधान का हवाला देते हुए आंद्रेई लुगोवोई का प्रत्यर्पण करने से मना कर दिया था। उन पर 2006 में अलेक्सांद्र लित्विनेंको को लंदन में ज़हर देकर मारने का आरोप है।

फ्रांस ने फिल्म निदेशक रोमन पोलनस्की को शरण दी है जिन पर अमेरिका में 1977 में एक नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने के आरोप में मुकदमा चला था लेकिन सज़ा सुनाए जाने से पहले ही वो फ्रांस चले गए। पोलनस्की फ्रांसीसी नागरिक हैं।

चैरिटी संस्था जस्टिस में क्रिमिनल और ईयू जस्टिस पॉलिसी निदेशक जूड़ी ब्लैकस्टॉक ने कहा कि ब्रिटेन के क़ानून में अपने नागरिकों को प्रत्यर्पण से रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

दूतावास भी लंबे समय से राजनीतिक आरोपियों को शरण देते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत राजनयिक ठिकानों को संबधित राष्ट्र की संपत्ति माना जाता है। लेकिन इस पर सरकारों की अलग-अलग राय है। एक साल पहले जब विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज ने इक्वाडोर के दूतावास में शरण ली थी तब ब्रितानी सरकार ने डिप्लोमेटिक एंड काउंसलर प्रेमिसेज़ एक्ट (1987) को लगाने पर विचार किया था।

आनंद दूबे के मुताबिक, “दूतावास में शरण लेने का प्रचलन दक्षिण अमेरिका में ज़्यादा है। वहां सरकारों के बीच समझौतों में इसका प्रावधान है। उदाहरण के लिए अगर पेरू में विपक्ष के नेता सरकार गिराने की नाकाम कोशिश करते हैं तो वो कोलंबिया के दूतावास में शरण ले सकते हैं। लेकिन ब्रिटेन की सरकार इस तरीके को मान्यता नहीं देती है।”
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