जर्मन तानाशाह हिटलर का नाम जेहन में आते ही, यहूदियों के नरसंहार की याद आती है। दूसरे विश्वयुद्ध की याद आती है। किस तरह एक इंसान की सनक की वजह से पांच करोड़ से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। हम सब यही जानते हैं कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन जैसे मित्र देशों की सेनाओं ने मिलकर हिटलर का खात्मा किया।
मगर, हिटलर के खिलाफ आम जर्मन लोगों ने भी अपने अपने तरीके से आवाज उठाई थी। ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी कहानियां हम जानते हैं। किसी पर उपन्यास लिखा गया, तो किसी पर फिल्म या डॉक्यूमेंट्री बनी। इस बार के बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में ऐसी ही एक फिल्म देखने को मिली। जिसमें हिटलर का विरोध करने वाले एक दंपति की कहानी है। फिल्म का नाम है 'अलोन इन बर्लिन'।
सुनने में ही नहीं असल तजुर्बे में भी बड़ा अजीब लगता है कि आप बर्लिन में हैं, बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में हैं और एक ऐसी फिल्म के बारे में बात कर रहे हैं जिसके नाम में भी बर्लिन है। मगर इस फिल्म के किरदार अंग्रेजी में बोलते हैं। 'अलोन इन बर्लिन' ऐसे विरोधाभास बयां करने वाली फिल्म है। वैसे, पश्चिमी जगत की फिल्मों में यह चलन आम है। हिटलर के दौर की फिल्मों में अक्सर किरदार, जर्मन के अलावा दूसरी भाषाएं बोलते नजर आते हैं।
फिल्म बयां हिटलर की कहानी
हमने सोचा था कि अब वह दौर पीछे छूट गया। जर्मनी बदल गया, जर्मनी के बारे में लोगों की राय भी बदली होगी लेकिन, अफसोस, ऐसा नहीं हुआ। हालांकि 'अलोन इन बर्लिन के निर्माता' फ्रेंच एक्टर, विंसेंट पेरेज ने फिल्म को जर्मन जबान में बनाने की कोशिश की थी। मगर, इसके लिए वह पैसे नहीं जुटा पाए।
आप जिस परिवेश की फिल्म बना रहे हों, अगर उसी जबान में बनाएं तो किरदार ज्यादा असरदार मालूम होते हैं। जैसे, 'अलोन इन बर्लिन' जैसी स्टोरीलाइन वाली जर्मन फिल्म, 'द लाइव्स ऑफ अदर्स'। ये फिल्म बहुत कामयाब रही थी। बहरहाल, हम बात करते हैं 'अलोन इन बर्लिन की'।
ये फिल्म जर्मन लेखक हैन्स फालदा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। हैन्स का उपन्यास एक सच्ची घटना पर था। ये दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हिटलर के खिलाफ छपने वाले कुछ गिने-चुने पहले उपन्यासों में एक था। कहानी में गिने चुने किरदार हैं। ये ऑटो और एना क्वांगेल नाम के जर्मन दंपति की जिंदगी की कहानी बयां करती है।
दंपति ने रची साजिश
दोनों हिटलर के दौर के आम जर्मन शहरी हैं। ऑटो क्वांगेल, एक फैक्ट्री में काम करने वाला ईमानदार किस्म का फोरमैन है। वहीं, उसकी पत्नी एना 'नाजी वाइव्ज लीग' के लिए पैसे जुटाने का काम करती थी। ये किरदार हॉलीवुड के कलाकारों, ब्रेंडेन ग्लीसन और एमा थॉमसन ने निभाए हैं।
क्वांगेल दंपति, बर्लिन में बहुत ही बोरिंग जिंदगी जी रहे हैं। अपने-अपने काम से जब वो लौटते हैं तो दोनों में बहुत कम बात होती है, गिने-चुने लफ्ज इस्तेमाल होते हैं। अपने छोटे से फ्लैट में यूं ही, बिना किसी मंजिल की परवाह किए दोनों ठहरे पानी सी उबाऊ जिंदगी बिता रहे हैं।
इस ठहरी हुई जिंदगी में भूचाल आ जाता है, जब क्वांगेल दंपति को पता चलता है कि उनका बेटा, फ्रांस में जंग के दौरान मारा गया है। जब जर्मनी के बाकी लोग फ्रांस के ऊपर अपने देश की जीत का जश्न मना रहे होते हैं, क्वांगेल दंपति अपने बेटे के मारे जाने के शोक में डूबे हैं। ऑटो क्वांगेल को हिटलर एक विजेता नहीं, बल्कि झूठा, नफरत करने वाला हत्यारा लगता है। शांत रहने वाले ऑटो के अंदर का बागी इंसान जाग उठता है। वह अपने ही तरीके से हिटलर की राह में रोड़े अटकाने के मिशन पर चल पड़ता है।
कुछ इस तरह से करते थे साजिश
हिटलर के विरोध के लिए वह एकदम अलग तरह की साजिश रचता है। वो पोस्टकार्ड्स पर, पर्चों में हिटलर के खिलाफ लिखकर, गुमनाम तरीके से कभी किसी के दरवाजे पर तो कभी किसी इमारत की सीढ़ियों पर छोड़ आता है। इन पर्चों में, 'हिटलर ने मेरे बेटे को मार डाला' या फिर, 'हिटलर यूरोप को बर्बाद कर देगा' लिखा होता है। इस काम में उसकी पत्नी एना भी शामिल हो जाती है।
फिल्म में ब्रेंडन ग्लीसन और एमा थॉमसन जिस तरह अपने जर्मन किरदार जीते हैं, इससे उनकी एक्टिंग की गहराई का अहसास होता है। एना के तौर पर थॉमसन एक नरमदिल, कमजोर मगर सिर उठाकर जीने वाली बीवी के तौर पर नजर आती है। वहीं ग्लीसन ने अपना दर्द सीने में छुपाए ऑटो क्वांगेल का किरदार भी बखूबी जिया है। जिसके चेहरे पर उसके दिल के भीतर छिपे घाव दिखाई नहीं देते।
उसे देखकर लगता है कि ऐसे बागी पर्चे लिखना कोई बड़ी बहादुरी का काम नहीं। बल्कि उस जैसे लोगों के लिए यही सही तरीका है अपनी आवाज-अपनी तकलीफ बयां करने का। मगर, यही सच के करीब दिखने वाला अभिनय इस फिल्म की कमजोरी मालूम होता है। दरअसल फिल्म की कहानी ऐसी है कि बहुत आगे जा नहीं सकती। देखने वाले को भी मालूम है कि आगे क्या होने वाला है। इससे फिल्म में रोमांच महसूस नहीं होता।
पर्चों को पढ़कर क्या राय कायम किया?
ऑटो का इरादा हिटलर के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन छेड़ने का बिल्कुल नहीं है। न वह विरोध का कोई नया तरीका आजमाना चाहता है। इसलिए उसका नियमित रूप से पोस्टकार्ड लिखना एक वक्त बाद उबाऊ लगने लगता है।
'अलोन इन बर्लिन' में कोई रोमांच नहीं, कोई पेंच-ओ-खम नहीं। पोस्टकार्ड लिखकर फेंकने के अलावा अगर कुछ और काम क्वांगेल दंपति करते हैं तो वह है नाजी अफसरों से बचने की जुगत। इसमें भी कोई नयापन नहीं। जहां कहीं वो नाजी खुफिया अफसरों या पुलिसवालों को देखते हैं, वहां से निकल लेते हैं। और, सबसे बड़ी बात ये कि हमें ये भी नहीं मालूम होता कि हिटलर के खिलाफ, ऑटो के पर्चे-पोस्टकार्ड कोई असर छोड़ पा रहे हैं या नहीं।
आखिर लोग उसके पर्चों को पढ़कर क्या राय कायम कर रहे हैं? फिल्म की कहानी और बोरिंग लगने लगती है, जब मालूम होता है कि ऑटो को अपनी गिरफ्तारी का कोई खौफ नहीं। वह बचने का कोई प्लान नहीं बना रहा। न गिरफ्तार होने की सूरत में किसी तरह की मुखालिफत का उसका इरादा है।
बेटे के मरने का लेना था बदला
उसके लिए दांव पर कुछ भी नहीं। न उसकी जिंदगी, न मिशन। ऐसी सूरत में वह गिरफ्तार होता है तो किसी नुकसान का डर नहीं और बच जाने की सूरत में कोई फायदा नजर नहीं आता। यह बात ठीक भी लगती है। अपने घर का चिराग गंवाने के बाद, आखिरी क्वांगेल दंपति के पास गंवाने के लिए है भी क्या? मगर देखने वाले, फिल्म के इस पहलू से और बोर ही होते हैं। जैसे क्वांगेल को इंतजार है खुद के पकड़े जाने का।
वैसे ही दर्शक भी उसकी गिरफ्तारी के इंतजार में थिएटर में बैठे होते हैं कि कब उसे नाजी अफसर पकड़ें और वो घर जाएं। फिल्म में एक ही दिलचस्प किरदार है, इंस्पेक्टर एस्चेरिख। उसे अपनी नैतिकता पर कोई शक नहीं। वह मानता है कि उसकी जिम्मेदारी, ये देशविरोधी पर्चे लिखकर फेंकने वाले अपराधी को पकड़ना और कैदखाने में डालना है।
मगर, ये साफ दिल इंस्पेक्टर भी हिटलर की खुफिया पुलिस एसएस के अफसर की बेदिली पर हैरान हो जाता है। जो उस पर लगातार किसी न किसी को गिरफ्तार करने का दबाव बनाता रहता है। लेकिन, इंस्पेक्टर का किरदार भी फिल्म में कोई चौंकाने वाला रोमांच नहीं पैदा कर पाता। हिटलर के अफसर निर्दयी थे। इसमें कोई नयापन तो नहीं। कुल मिलाकर, हिटलर के खिलाफ आम आदमी के विरोध की यह आवाज बेहद कमजोर मालूम होती है। जिसे चाहकर भी सुन पाना मुश्किल है।