हवाई जहाज़ का सफ़र आजकल आम हो गया है। इसके मुक़ाबले पानी के जहाज़ से सफ़र करने वालों की तादाद कम होगी। आज पानी के जहाज़ से सफ़र करने का चलन कम हो गया है, क्योंकि ये महंगा भी है और इसमें दूरियां तय करने में वक़्त भी ज़्यादा लगता है। लेकिन एक दौर था जब हवाई जहाज़ कम थे और लोग पानी के जहाज़ से लंबी दूरियां तय किया करते थे।
पानी के जहाज़ के ज़रिए ही यूरोपीय देशों ने दुनिया के तमाम देशों को अपना ग़ुलाम बनाया और बरसों तक राज किया। इंसान ने जैसे-जैसे तरक़्क़ी की, जहाज़ भी बेहतर बनने लगे। एक दौर ऐसा आया जब विशाल जहाज़ बनाए जाने लगे। इन जहाज़ों पर एक छोटा सा शहर चलता था। जहाज़ पर ही ऐश और आराम की हरेक चीज़ उपलब्ध होती थी। चलिए आज आपको कुछ ऐसे ही बड़े जहाज़ों के बारे में बताते हैं जो इतिहास बन चुके हैं।
इनमें दुनिया भर में सबसे चर्चित नाम है टाइटैनिक। इस पर बनी फ़िल्म की वजह से आज दुनिया भर में लोग इस शानदार जहाज़ के बारे में जानते हैं। टाइटैनिक अपनी ख़ूबसूरती, मज़बूती और सहूलतों के लिए एक मिसाल था। ये और बात है कि अपनी मंज़िल पर पहुंचने से पहले ही वो हादसे का शिकार हो गया। टाइटैनिक ने अपना सफर 1911 में शुरू किया था। लेकिन इस तरह के विशालकाय जहाज़ बनने का सिलसिला उन्नीसवीं सदी के पांचवें दशक से ही शुरू हो गया था।
1850 से लेकर 1900 के दरमियान ब्रिटेन के तीन बड़े जहाज़ अटलांटिक के आर-पार के सफ़र का ज़रिया थे। इनके नाम थे- क्यूनार्ड, इनमैन और व्हाइट स्टार। लेकिन जैसे जैसे ब्रिटेन में रईसों की तादाद बढ़ी, जहाज़ों पर मुसाफ़िरों की संख्या भी बढ़ने लगी। इस सफ़र को पुरसुकून और मज़ेदार बनाने की मांग भी बढ़ने लगी। जहाज़ पर बड़े होटलों जैसे आराम का इंतज़ाम किया जाने लगा। मुसाफ़िरों की तादाद बढ़ने और रईसाना सफ़र की डिमांड ने ब्रिटेन की इन तीनों कंपनियों के बीच मुक़ाबला बढ़ा दिया।
नतीजतन बड़े-बड़े क्रूज़ यानी विशाल जहाज़ समंदर में उतारे गए। उनमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया जो आज भी चलन में हैं। इनमैन ब्रिटेन की वो कंपनी थी, जिसने रिवायती जहाज़ों की जगह भाप के इंजन से चलने वाला पहला जहाज़ बनाया था।
इससे पहले जो जहाज़ चलते थे उनमें साइड पैडल का इस्तेमाल किया जाता था। इसकी रफ़्तार कम होती थी। वहीं भाप के इंजन से चलने वाले तेज़ रफ्तार जहाज़ों ने इस क्षेत्र में इंक़लाब ला दिया था। इनमैन कंपनी नई नई तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल करती। इनमैन की मुक़ाबिल कंपनी थी क्यूनार्ड, जो मुसाफ़िरों की हिफ़ाज़त पर ज़्यादा ज़ोर देती थी।