वार्षिक समीक्षा रिपोर्ट में परियोजनाओं में हो रही देर पर चिंता जताई गई है। विश्लेषकों ने कहा है कि ये समीक्षा रिपोर्ट इस बात के संकेत है कि ईयू नेता और अधिकारी ‘सैन्य मामलों में स्वतंत्रता’ हासिल करने की चाहे जितनी बड़ी बातें करते हों, असल में वे सैनिक क्षेत्र में मौजूद रुकावटों से नहीं निपट पा रहे हैं। वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू के मुताबिक 115 पेज की ये गोपनीय समीक्षा रिपोर्ट पिछले महीने सभी सदस्य देशों को भेजी गई। इसके मुताबिक 15 परियोजनाओं पर तय लक्ष्य की तुलना में काम देर से चल रहा हैं। उनमें छह की वजह कोरोना महामारी है। बाकी मामलों में क्यों देर हुई, इसे स्पष्ट नहीं किया गया है।
परियोजनाओं में अब हो सकती है कई वर्षों की देरी
रिपोर्ट में बताया गया है कि 14 परियोजनाओं को पूरा करने का जो समय तय किया गया था, उसमें अब कई वर्षों की देर हो सकती है। आठ परियोजनाओं की तो शुरू होने की तारीख ही अब बढ़ा दी गई है। अभी तक एक भी ऐसी परियोजना नहीं है, जो पूरा होने के लिहाज से अपने अंतिम चरण में हो। इस हाल से परेशान एक ईयू राजनयिक ने वेबसाइट पॉलिटिको से कहा- ‘कुछ परियोजनाएं तो सीधे तौर पर अपरिपक्व हैं। हम अभी सीखने के दौर में ही हैं।’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि सैन्य मामलों में साझा तौर पर अपने पांव पर खड़े होने की सोच ईयू में हाल के वर्षों में आई है। दशकों तक तो इस बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं समझी गई। कुछ सरकारों की दलील थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा हर देश का अपना अलग मामला है। कुछ देशों का तर्क था कि ईयू एक शांति परियोजना है, इसलिए उसे सैनिक मामलों में नहीं उलझना चाहिए। कई दूसरे देशों की राय थी कि सैनिक मामले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए इसमें ईयू को नहीं पड़ना चाहिए।
20 प्रस्तावों के लिए धन का आवंटन नहीं
लेकिन पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दौर में ईयू मे सोच बदली। ट्रंप ने जिस तरह अमेरिकी नीति में नाटो की अहमियत घटाई, उससे ईयू में ये राय मजबूत हुई कि ईयू सैन्य मामलों में हमेशा अमेरिका और नाटो पर निर्भर नहीं रह सकता। तभी जाकर पेस्को समझौता हुआ। लेकिन पर्यवेक्षकों की राय में ताजा समीक्षा रिपोर्ट से जाहिर हुआ है कि इस पर अमल की प्रगति अभी तक निराशाजनक है।
समीक्षा रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि अभी तक 20 प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए धन का आवंटन ही नहीं हुआ है। सदस्य देशों ने अपने खजाने से इसके लिए खर्च मुहैया कराने में रुचि नहीं ली है। इसीलिए कई परियोजनाओं के पूरा होने की तारीख ही अभी तय नहीं हो पाई है।