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यूरोप का डर्टी गेम बेअसर: बंद कमरों में भारत के खिलाफ नैरेटिव वॉर, PM मोदी की नीतियों से पुराने समीकरण ध्वस्त

सार

राजकिशोर की यूरोप डायरी: रूसी प्रणालियों और राफेल को 'आउटडेटेड' बताकर भारत की सैन्य साख गिराने की कोशिश की जा रही है। चीन-पाकिस्तान के 'हाइब्रिड वार' के हवाले से थिंक-टैंक और एक्सपर्ट्स के जरिए भारत को 'अस्थिर क्षेत्रीय शक्ति' दिखाने का एजेंडा चलाया जा रहा है। भारत की रूस से दोस्ती और पश्चिम से संवाद, पीएम मोदी की इस 'मल्टी-एलाइनमेंट' नीति से यूरोप असहज होता दिखता है।
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यूरोप के नैरेटिव वॉर के सामने खड़ी हुई 'मोदी वॉल' - फोटो : ANI
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विस्तार
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यूरोप के राजनीतिक गलियारों और ब्रुसेल्स से लेकर एस्टोनिया तक फैले थिंकटैंकों में इन दिनों भारत को लेकर एक अजीब सी सुगबुगाहट है। यह सुगबुगाहट भारत की बढ़ती शक्ति के स्वागत की नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को संदिग्ध बनाने की कवायद है। यहां बातचीत औपचारिक मंचों से ज्यादा कॉरिडोर और बैकडोर बैठकों में होती है। एक पैटर्न.. भारत के खिलाफ ऐसा नैरेटिव बुना जा रहा है जो मासूम तो कतई नहीं है। हालांकि, विरोधाभास ये है कि एक तरफ जहां यूरोप की हवाओं में फैला है कि भारत 'भविष्य की शक्ति' है, वहीं दूसरी तरफ थिंक-टैंकों की 'बैकडोर मीटिंग्स' में भारत की साख गिराने का एक सुनियोजित 'नैरेटिव ऑपरेशन' चल रहा है। यह अलग बात है कि इस बार भारत रक्षात्मक नहीं है। जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस 'रणनीतिक स्वायत्तता' से मिल रहा है, जिसने पश्चिम के पुराने समीकरणों को हिलाकर रख दिया है।
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विरोधाभासों का भंवर और कूस्क का राफेल दावा
यूरोप में भारत को लेकर कैसी दोहरी सोच चल रही है, इसका सबसे सटीक उदाहरण एस्टोनिया के रक्षा मंत्रालय के स्थायी सचिव काइमो कूस्क के साथ हुई चर्चा में मिलता है। कूस्क ने एक बेहद विवादास्पद और चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि "राफेल विमान इतने कमजोर साबित हुए कि हमें आश्चर्य हुआ कि कैसे चीनी जेट्स ने उन्हें मार गिराया।" यह बयान सीधे तौर पर उस नैरेटिव का हिस्सा है जो भारतीय सैन्य साख को कमतर आंकने के लिए गढ़ा जा रहा है। दिलचस्प यह है कि प्रोपेगेंडा और वास्तविकता का विरोधाभास इसी बातचीत में उजागर हो जाता है। अगले ही पल कूस्क यह भी स्वीकार करते हैं कि "भारत एक उभरती हुई महान रक्षा और आर्थिक शक्ति है।" एक तरफ भारतीय हथियारों की युद्ध-क्षमता पर सवाल उठाना और दूसरी तरफ उसे महाशक्ति मानना, यही वह मानसिक द्वंद्व है जिससे आज का यूरोप जूझ रहा है। वे भारत की ताकत को नकार नहीं पा रहे, इसलिए तकनीकी श्रेष्ठता के नैरेटिव पर हमला कर रहे हैं।

चीन-पाक की जुगलबंदी और मार्गस त्सखना का संतुलन
इस हाइब्रिड वॉरफेयर में चीन और पाकिस्तान के तर्क अक्सर यूरोपीय विशेषज्ञों की जुबान बनकर निकलते हैं। वे भारत को एक “अस्थिर क्षेत्रीय शक्ति” दिखाने की कोशिश करते हैं। वहीं, एस्टोनिया के विदेश मंत्री मार्गस त्सखना का नजरिया यहां भारत के पक्ष में एक बड़ा वजन डालता है। त्सखना कहते हैं कि "भारत आज पूरी दुनिया में संतुलन साधने की अद्भुत क्षमता रखता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार ऐसा करते दिखाई देते हैं।" यह बयान उस नैरेटिव को ध्वस्त कर देता है जो भारत को केवल एक 'क्षेत्रीय खिलाड़ी' साबित करना चाहता है। त्सखना की यह टिप्पणी साबित करती है कि यूरोप का एक धड़ा मोदी के उस 'मल्टी-एलाइनमेंट' का कायल है, जहां भारत रूस और पश्चिम के बीच बिना झुके अपनी जगह बना रहा है।
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नैरेटिव के चक्रव्यूह को भेदता मोदी फैक्टर
इस पूरे प्रोपेगंडा के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक अभेद्य दीवार की तरह खड़ी है। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो दबाव में झुकता नहीं और नैरेटिव के जाल में फंसता नहीं। जब पश्चिमी देश भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव डालते हैं, तो मोदी का समरकंद वाला मंत्र कि "यह युद्ध का युग नहीं है", उन्हें निरुत्तर कर देता है। यह बयान न केवल शांति की अपील था, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र की वह हुंकार थी जिसने यह साफ कर दिया कि भारत किसी एक 'ब्लॉक' का अनुयायी नहीं बनेगा। मोदी के नेतृत्व में भारत ने 'रणनीतिक स्थिरता' को अपनी नई ताकत बना लिया है, जिससे यूरोप के पुराने समीकरण ध्वस्त हो गए हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता की जीत और बढ़ता पश्चिमी दबाव
रूस की सीमा से सटे देशों में भारत के रूस के साथ ऐतिहासिक रिश्तों को अक्सर 'नैतिकता' के चश्मे से देखा जाता है। नैरेटिव यह धकेला जाता है कि यदि भारत को “लोकतांत्रिक गठबंधन” का हिस्सा बनना है तो उसे अपनी स्वायत्तता छोड़नी होगी। हालांकि, हकीकत इसके उलट है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को भी निभाएगा और साथ ही पश्चिम के साथ तकनीकी साझेदारी भी करेगा। भारत अब खरीदार की तरह नहीं, बल्कि एक बराबर के साझेदार की तरह मेज पर बैठता है। यही वह आत्मनिर्भरता है जो यूरोप के कुछ धड़ों को असहज करती है।

कमजोरी नहीं, बढ़ती हैसियत का संकेत
यूरोप से लौटते वक्त जो बात सबसे साफ़ दिखती है, वह यह है कि भारत के खिलाफ जो भ्रम फैलाया जा रहा है, वह हमारी कमजोरी नहीं बल्कि हमारी बढ़ती हैसियत का संकेत है। जब काइमो कूस्क जैसे अधिकारी राफेल पर सवाल उठाते हैं और मार्गस त्सखना जैसे मंत्री मोदी की 'संतुलन की शक्ति' की तारीफ करते हैं, तो साफ हो जाता है कि यूरोप भारत की नई ताकत से 'असहज' भी है और 'प्रभावित' भी। आज का नया बारत अब अपनी क्षमता दूसरों से प्रमाणित नहीं करवाता। मोदी के नेतृत्व वाले भारत ने यह संदेश दे दिया है कि वह अपनी कहानी का लेखक खुद है। बंद कमरों में खटकती यही सच्चाई आज यूरोप की सबसे बड़ी बेचैनी है और भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत भी।
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