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‘समिट फॉर डेमोक्रेसी’ में किन देशों को बुलाएंगे जो बाइडेन, चुनाव जीतने से पहले किया था एलान

Mon, 30 Nov 2020 12:54 PM IST
Tanuja Yadav वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन

सार

  • किन देशों को बुलाएंगे बाइडेन अपने ‘समिट फॉर डेमोक्रेसी’ में?
  • पद संभालने के बाद बाइडेन का प्रमुख एजेंडा है सहयोगी देशों को साथ लाने का
  • रूस और चीन की चुनौतियों से मुकाबले को लेकर भी बनेगी रणनीति
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Joe Biden - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
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अब इस बात पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है कि अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ‘समिट फॉर डेमोक्रेसी’ (लोकतंत्र के लिए सम्मेलन) में किन देशों को आमंत्रित करेंगे? राष्ट्रपति चुनाव जीतने से पहले ही बाइडेन ने यह एलान किया था कि राष्ट्रपति बनने के बाद वे दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों का एक सम्मेलन बुलाएंगे।

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तब विश्लेषकों ने कहा था कि इसके पीछे बाइडेन का मकसद यह संदेश देना होगा कि डोनाल्ड ट्रंप के बाद के दौर में अमेरिका अपने ‘घर और बाहर’ दोनों जगहों पर लोकतंत्र को मजबूत करने लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन अब मिली जानकारियों के मुताबिक प्रस्तावित सम्मेलन का टाइटल ‘समिट ऑफ डेमोक्रेसीज’ के बजाय ‘समिट फॉर डेमोक्रेसी’ कर दिया गया है।

लोकतंत्र की राह पर चलने वाले देशों को आमंत्रण
जानकारों के मुताबिक अगर पहला टाइटल होता तो उसमें उन सभी देशों को बुलाना जरूरी समझा जाता, जो खुद को लोकतंत्र कहते हैं। अब नए टाइटल के साथ आयोजकों को इस बात की सुविधा होगी कि वे उन्हीं देशों को बुलाएं, जिन्हें वे सचमुच लोकतंत्र की राह पर चलता हुआ मानते हैं।
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अमेरिकी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक इस सम्मेलन में उन देशों को नहीं बुलाया जाएगा, जिनके बारे में अमेरिका की राय यह है कि वहां लोकतंत्र को संकुचित किया जा रहा है। अब यहां कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या सम्मेलन में तुर्की, मिस्र हंगरी, पोलैंड और फिलीपीन्स को बुलाया जाएगा, जो अमेरिका के सहयोगी देश रहे हैं, लेकिन जहां के नेता अब अधिनायकवादी रास्ते पर चल रहे हैं।

भारत को शायद ना मिले आमंत्रण
जानी-मानी वेबसाइट पोलिटिको.कॉम की एक रिपोर्ट में कहा गया है- यहां तक कि भारत जैसा देश, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है, वहां हाल में लोकतंत्र विरोधी रूझान को देखते हुए मुमकिन है कि उसे आमंत्रण ना मिले।”

लेकिन अनेक अमेरिकी टीकाकारों ने ध्यान दिलाया है कि इस वक्त अमेरिका बाकी दुनिया को लोकतंत्र के बारे में उपदेश देने की स्थिति में नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिका में खुद ऐसे हालात बने, जिनसे अमेरिकी लोकतंत्र पर सवाल उठे। अमेरिकी संस्थाओं की बहुप्रचारित मजबूती और प्रतिबद्धता की असलियत भी इस दौरान बेनकाब हो गई।

उधर ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव प्रणाली की साख पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं। खुद अमेरिका में करोड़ों लोगों की राय है कि इस बार के चुनाव का नतीजा धांधली से तय हुआ है। इसलिए कुछ अखबारी टिप्पणियों में जो बाइडेन को सलाह दी गई है कि प्रस्तावित सम्मेलन में वे दुनिया भर में लोकतंत्र मजबूत करने के बारे में एकतरफा सलाह देने के बजाय दूसरों की राय ज्यादा सुनें, तभी ये आयोजन सार्थक हो सकेगा।

वर्चुअल सम्मेलन की संभावना ज्यादा
अभी यह तय नहीं है कि सम्मेलन का आयोजन वर्चुअल होगा या इसमें नेताओं को बुलाया जाएगा। अभी अमेरिका में कोरोना वायरस संक्रमण की जो हालत है, उसे देखते हुए वर्चुअल सम्मेलन की संभावना ही ज्यादा है। खबरों के मुताबिक बाइडेन के कुछ सलाहकारों ने राय दी है कि कोरोना महामारी संभलने के बाद ही सम्मेलन आयोजित किया जाए, ताकि नेता सीधे इसमें भाग ले सकें।

लेकिन बताया जाता है कि बाइडेन राष्ट्रपति बनने के कुछ महीनों के अंदर ये सम्मेलन करना चाहते हैं। अपने कार्यकाल के पहले साल में तो वे इसे अवश्य ही कर डालना चाहते हैं। बाइडेन के रणनीतिकारों का कहना है कि इस सम्मेलन से यह साफ संदेश जाएगा कि चीन या रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के हमले से लोकतंत्र की रक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने से अब अमेरिका पीछे नहीं हटेगा।

कुल संदेश यह है कि अनुदार ताकतें अमेरिकी सिस्टम के लिए चुनौती पेश कर रही हैं। अमेरिका उसका जवाब फ्रंट फुट पर आकर देना चाहता है। जो बाइडेन इस बात को ही अपने कार्यकाल की खास पहचान बनाना चाहते हैँ।

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