यहां शुरू होने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से एक हफ्ता पहले यूरोप के बारे में आई एक रिपोर्ट ने फिर बताया है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा किस हद तक बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप-27) के दौरान होने वाली चर्चाओं में ऐसे खतरों से निपटने के उपायों पर चर्चा होगी। साथ ही मिस्र के इस शहर में होने वाले सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य में विभिन्न देशों के पिछड़े रहने की समस्या पर गौर किया जाएगा।
ताजा रिपोर्ट वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएमओ) ने जारी की है। इसमें बताया गया है कि जलवायु संकट गहराने के साथ ही यूरोप में गर्मी बाकी दुनिया की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से धरती का औसत तामपान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है। वैज्ञानिक वर्षों से यह चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तापमान में इस वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नहीं रोका गया, तो दुनिया को उसके भीषण नतीजे भुगतने होंगे। डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते 30 वर्षों में यूरोप के तापमान में बाकी दुनिया की तुलना में दोगुना वृद्धि हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र का तापमान बढ़ने के कारण यूरोप को मौसम के चरम रूप का सामना करना पड़ रहा है। हर साल जुलाई में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। पिछले 15 साल में ऐसी घटनाओं में चार गुना बढ़ोतरी हुई है। इसका स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बहुत खराब असर पड़ा है। यूरोप की कई नदियां सूखने लगी हैं और कई देशों को सूखे का सामना करना पड़ा है।
डब्ल्यूएमओ ने अपनी रिपोर्ट 2021 में रहे मौसम के हाल का खास अध्ययन करने के बाद तैयार की है। इस अध्ययन से सामने आया कि पिछले साल जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप के पांच लाख लोग सीधे प्रभावित हुए। मौसम की चरम स्थितियों के कारण 50 बिलियन डॉलर के बराबर नुकसान हुआ। 1997 से 2021 के बीच आल्पस पर्वतमाला पर स्थित ग्लेशियर्स पर बर्फ की परत 30 मीटर घट चुकी है।
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन के मुताबिक डब्ल्यूएमओ के महासचिव पेटेरी तालस ने कहा- ‘यूरोप गरम हो रही दुनिया की एक जीवंत तस्वीर बन गया है। इसने हमारा ध्यान इस तरफ खींचा है कि अच्छी तरह तैयार देश भी मौसम की चरम स्थितियों से सुरक्षित नहीं हैं। 2021 में यूरोप के बड़े हिस्से को गर्म हवाओं, सूखे, जंगलों की आग आदि का सामना करना पड़ा।’
विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि 1990 से 2020 के बीच ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 31 फीसदी की कमी आई। लेकिन यह कमी पर्याप्त साबित नहीं हुई है। यूरोपीय देशों ने 1990 के उत्सर्जन स्तर की तुलना में 55 फीसदी की कटौती लक्ष्य रखा था। लेकिन वे इसमें पिछड़ते रहे। इसका नतीजा अब सामने आ रहा है।
डब्ल्यूएमओ ने कहा है कि उसने अपनी रिपोर्ट से विज्ञान आधारित सूचनाएं उपलब्ध कराई हैं। अब नजरें इस टिकी होंगी कि शरम अल-शेख में इकट्ठा होने वाले विश्व नेता अपनी नीति तय करने में ऐसी सूचनाओं को कितना महत्त्व देते हैं।