आर्थिक विशेषज्ञों के बीच ये आमराय देखने को मिल रही है कि दुनिया को महंगाई से अगले एक साल तक राहत नहीं मिलने वाली है। इसकी वजह ये समझी जा रही है कि वर्तमान ऊंची महंगाई का कारण सिर्फ यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगाए गए प्रतिबंध नहीं हैं। हकीकत यह है कि महंगाई फरवरी में युद्ध शुरू होने से पहले ही बढ़ने लगी थी।
चीन के आर्थिक विशेषज्ञ वेन शेंग ने महंगाई के मौजूदा दौर के लिए अमेरिका की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स में लिखे एक लेख में उन्होंने कहा है कि 2021 की पहली छमाही में जो बाइडन प्रशासन ने 1.7 ट्रिलियन डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज पारित कराया था। उसके पहले कोराना काल में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी उदारता से अमेरिकी वासियों को आर्थिक मदद दी। इसके लिए अमेरिका के सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व ने खूब नोट छापे। इससे मुद्रास्फीति बढ़ी। उसका असर अब पूरी दुनिया पर इसलिए देखने को मिल रहा है, क्योंकि अमेरिकी मुद्रा डॉलर सारी दुनिया की रिजर्व करेंसी है।
अन्य विशेषज्ञ भी इस राय से सहमत हैं कि अमेरिका की असीमित नोट छापने की नीति ने महंगाई की स्थितियां पैदा की हैं। 2008-09 की मंदी के बाद से अमेरिका में क्वांटीटिव ईजिंग नाम से ये नीति अपनाई गई थी। कोरोना महामारी और यूक्रेन युद्ध ने हालात और बदतर कर दिए हैं।
अमेरिका में बढ़ी महंगाई के पीछे एक कारण वहां चीन के खिलाफ छेड़ा गए व्यापार युद्ध को माना जाता है। इसके तहत पूर्व डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने चीन से आयात होने वाली 360 बिलियन डॉलर की वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगा दिए थे। इस वजह से चीनी आयात तो नहीं घटा, मगर अमेरिकी उपभोक्ताओं को वे चीजें महंगी जरूर मिलने लगीं। इसका असर कुल मुद्रास्फीति दर पर देखने को मिला है। राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडन ने भी उन अतिरिक्त शुल्कों को जारी रखा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर देशों की सरकारों के पास ऐसे कोई उपाय मौजूद नहीं हैं, जिन्हें वे अपनी जनता को मौजूदा महंगाई से बचाने के लिए उठा सकें। डॉलर से अर्थव्यवस्था के बंधे रहने के कारण दुनिया भर के तमाम देश अमेरिकी नीतियों की कीमत चुकाने को मजबूर बने हुए हैं।