इस खबर ने दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है कि विश्व का कर्ज जीडीपी अनुपात 2020 में 356 फीसदी तक पहुंच गया। यह 2019 की तुलना में 35 फीसदी ज्यादा है। कर्ज के इस अनुपात का मतलब यह है कि दुनिया में पिछले साल जितना सकल उत्पादन हुआ, उसके मूल्य से 356 गुना ज्यादा कर्ज दुनिया पर मौजूद था। जानकारों के मुताबिक 2020 में इस मामले में इतनी बढ़ोतरी इसलिए हुई, क्योंकि कोरोना महामारी के कारण ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था सिकुड़ी, जबकि लगभग तमाम देशों ने ज्यादा कर्ज लेकर महामारी से निपटने पर असामान्य रूप से ज्यादा खर्च किए।
अर्थशास्त्रियों ने ध्यान दिलाया है कि अतीत में जब कभी जीडीपी की तुलना में कर्ज की मात्रा में एक सीमा से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, तो उसके हानिकारक नतीजे सामने आए हैं। विश्व बैंक ने पिछले साल एक अध्ययन में ध्यान दिलाया था कि 1970 के बाद से कर्ज बढ़ने का परिणाम वित्तीय संकट के रूप में सामने आया है। इस अध्ययन में कहा गया कि 1970 के बाद कर्ज की चौथी लहर 2010 में शुरू हुई। इस दौरान बढ़ी कर्ज की मात्रा कोरोना महामारी आने के पहले ही चिंता का विषय बन चुकी थी। जानकारों ने कहा है कि वैक्सीन आने के कारण इस साल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सुधार होगा, लेकिन इसका कर्ज की मात्रा पर कितना फर्क पड़ेगा, ये कहना अभी मुश्किल है।
इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (आईआईएफ) की तरफ से दी गई ताजा जानकारी के मुताबिक पिछले साल गैर-वित्तीय प्राइवेट सेक्टर का कर्ज पूरी दुनिया के सकल आर्थिक उत्पाद की तुलना में 165 फीसदी तक ज्यादा था। ये स्तर 2008 के वित्तीय संकट के समय की कर्ज की मात्रा से भी ज्यादा है। 2008 में वैश्विक कर्ज अनुपात में वृद्धि 10 फीसदी हुई थी। 2009 ये इजाफा 15 फीसदी हुआ था।
आईआईएफ के मताबिक 2020 में वैश्विक कर्ज 281 खरब डॉलर तक पहुंच गया। 61 देशों में सरकारी और निजी कर्ज में 25 खरब डॉलर की वृद्धि हुई। पिछले एक दशक में इन देशों ने 88 खरब डॉलर का कर्ज लिया है। यानी एक दशक में लिए गए कुल कर्ज का एक चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा सिर्फ पिछले साल लिया गया। 2020 में कुल सरकारी कर्ज वैश्विक जीडीपी के 105 फीसदी तक पहुंच गया। 2019 में यह 88 फीसदी था। 2020 में इस कर्ज में 12 खरब डॉलर की वृद्धि हुई, जबकि 2019 में ये वृद्धि 4.3 खरब डॉलर की रही थी। वित्तीय क्षेत्र के कर्ज में पांच फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 2016 के बाद पहली बार इस सेक्टर पर कर्ज बढ़ा है। ये आंकड़े बताते हैं कि कोरोना महामारी ने कैसे दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
अर्थशास्त्रियों ने पहले के अध्ययनों में कहा है कि अगर किसी देश में जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात 72 फीसदी से अधिक हो जाता है, तो उसका सीधा असर आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ता है। साथ ही इससे मुद्रास्फीति बढ़ने और कर्ज पर ब्याज दर में बढ़ोतरी की संभावना पैदा होती है। अब चूंकि कर्ज की मात्रा काफी बढ़ गई है, तो अर्थशास्त्रियों को अंदेशा है कि उसका असर महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के उबरने पर पड़ेगा। एक और समस्या यह है कि 2020 में लिया गया लगभग सारा कर्ज फौरी जरूरतों के लिए लिया गया। उनका भविष्य के विकास की योजनाओं में निवेश नहीं हुआ है। अब चूंकि विभिन्न देशों की कर्ज लेने की क्षमता घट गई है, इसलिए भविष्य के विकास पर इसका बहुत खराब असर पड़ सकता है।
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका भी कर्ज की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। वहां अनुमान लगाया गया है कि अगले दस साल तक जीडीपी वृद्धि दर दो फीसदी से नीचे रहेगी। वहां दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि संघीय सरकार पर सालाना जीडीपी से ज्यादा कर्ज चढ़ गया है। यह फिलहाल जीडीपी से 107 फीसदी ज्यादा है। अब राष्ट्रपति जो बाइडन ने 1.9 खरब डॉलर के कोरोन राहत पैकेज का एलान किया है। इससे कर्ज का बोझ और बढ़ेगा।