आर्मेनिया और अजरबैजान के शीर्ष नेता शुक्रवार को अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात कर सकते हैं। यह मुलाकात आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर हो सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच बीते चार दशकों से जारी संघर्ष समाप्त हो जाएगा। ट्रंप ने एक बयान में इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पेशिनयान और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव अमेरिका के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जिससे दोनों देश अपनी आर्थिक क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे।
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच शांति समझौता हुआ तो उससे दोनों देशों के बीच परिवहन कॉरिडोर को लेकर भी सहमति बन सकती है, जो 1990 के दौरान से ही बंद है। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि समझौते के तहत अमेरिका को कॉरिडोर को विकसित करने का अधिकार मिलेगा और इस कॉरिडोर का नाम भी ट्रंप रूट रखा जा सकता है। हालांकि अमेरिकी सरकार इसे विकसित नहीं करेगी बल्कि निजी कंपनियों के साथ सहयोग से इस ट्रांजिट कॉरिडोर को विकसित करने की योजना है।
ट्रांजिट कॉरिडोर बनाने पर सहमति
यह कॉरिडोर अजरबैजान के नखचिवान क्षेत्र को बाकी देश से जोड़ेगा। अभी नखचिवान क्षेत्र, अजरबैजान के बाकी क्षेत्र से कटा हुआ है और आर्मेनिया से गुजरने वाले 32 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर से इस इलाके को बाकी अजरबैजान से जोड़ा जाएगा। इस कॉरिडोर के तहत रेल लाइन, तेल और गैस लाइन, फाइबर ऑप्टिक लाइंस के साथ ही मालवाहक वाहनों और लोगों की आवाजाही की सुविधा मिलेगी। इस साल की शुरुआत में ट्रंप के विशेष सलाहकार स्टीव विटकॉफ ने अजरबैजान की राजधानी बाकू का दौरा किया था, जिसके बाद दोनों देशों के नेताओं के साथ उनकी बातचीत हुई और शांति समझौते पर सहमति बनी।
चार दशकों का तनाव होगा खत्म
आर्मेनिया और अजरबैजान में चार दशकों से हिंसा और लड़ाई जारी थी और यह लड़ाई काराबाख क्षेत्र पर कब्जे को लेकर थी। दरअसल सोवियत संघ के समय में काराबाख क्षेत्र अजरबैजान का हिस्सा था, लेकिन यहां आर्मेनियाई आबादी रहती थी और इस इलाके को स्वायतत्ता प्राप्त थी। आर्मेनिया ईसाई और अजरबैजान मुस्लिम बहुल देश हैं। मुस्लिम ओटोमन साम्राज्य के समय में यहां बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ और इतिहास के अनुसार, करीब 15 लाख आर्मेनियाई लोगों को मौत के घाट उतारा गया। इसे लेकर साल 1988 में काराबाख इलाके में रहने वाले आर्मेनियाई लोगों ने बगावत कर दी और आर्मेनिया के साथ मिलने का एलान कर दिया।
सोवियत संघ के बिखराव के बाद जब आर्मेनिया आजाद हुआ तो आर्मेनिया और अजरबैजान में काराबाख इलाके के लिए लड़ाई हुई। इस लड़ाई में करीब 30 हजार लोग मारे गए और 10 लाख से ज्यादा लोगों के विस्थापित होने का अनुमान है। साल 1994 में दोनों पक्षों में युद्धविराम हुआ, तब तक आर्मेनियाई लोगों ने काराबाख इलाके पर कब्जा कर लिया था। कई दशकों तक दोनों पक्षों में मध्यस्थता की कोशिश हुई, लेकिन जब ये कोशिश नाकाम हुई तो सितंबर 2020 में अजरबैजान ने फिर से काराबाख पर हमला कर दिया और इस बार उसका साथ दिया तुर्किए ने। करीब छह हफ्ते की लड़ाई के बाद अजरबैजान ने काराबाख पर कब्जा कर लिया और यहां रहने वाले आर्मेनियाई लोगों को यहां से भागना पड़ा।
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पुतिन के यहां भी मात दे गए ट्रंप
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच विवाद में पहले रूस का दबदबा था और रूस द्वारा आर्मेनिया के लोगों का समर्थन किया जाता था। हालांकि जब सितंबर 2020 में लड़ाई शुरू हुई तो यूक्रेन युद्ध में फंसे होने के चलते रूस इस बार आर्मेनिया की मदद के लिए नहीं आ सका। इसका खामियाजा आर्मेनिया को हार के रूप में झेलना पड़ा। यही वजह है कि अब आर्मेनिया में रूस के प्रति नाराजगी है और अब आर्मेनिया का झुकाव पश्चिमी देशों की तरफ बढ़ गया है। अब ट्रंप दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर रहे हैं और अगर शांति समझौता हो जाता है तो यकीनन इस क्षेत्र में भी अमेरिका का दबदबा बढ़ेगा।
ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध भी रुकवाने की बात कही थी, लेकिन जब रूस ने ट्रंप के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया तो ट्रंप ने रूस के सहयोगी देशों जैसे भारत, चीन आदि पर भारी-भरकम टैरिफ का एलान कर दिया। इस दबाव का असर कहें या कुछ और पुतिन अब अगले हफ्ते ट्रंप से मिलने के लिए तैयार हो गए हैं। साथ ही सीरिया में भी अमेरिका ने रूस के दबदबे को खत्म करते हुए वहां नई सरकार को समर्थन देकर वहां भी अपना प्रभुत्व जमा लिया है। ऐसे में कह सकते हैं कि फिलहाल पुतिन हर जगह ट्रंप से मात खाते नजर आ रहे हैं।