फ्रांस में स्कूलों की खराब स्थिति, शिक्षकों की कमी और कमजोर बुनियादी सुविधाओं को लेकर सितंबर से चल रहा प्रदर्शन मंगलवार को बड़ा हो गया और 2.5 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। कई जगह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन कुछ शहरों में आगजनी और पुलिस से झड़प भी हुई। ट्रंप ने इसे शिक्षा का मुद्दा मानने के बजाय बड़े पैमाने पर प्रवासन और इस्लाम से जोड़ दिया है। फ्रांस सरकार और प्रदर्शनकारी संगठनों के आंकड़ों में भी आंदोलन से प्रभावित स्कूलों की संख्या को लेकर अंतर है।
फ्रांस में स्कूलों की बदहाल स्थिति को लेकर सितंबर से चल रहा प्रदर्शन मंगलवार को अपने सबसे बड़े स्तर पर पहुंच गया। देशभर में 2.5 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों की मुख्य शिकायतें स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब इमारतें, कम बजट और जरूरी सुविधाओं की कमी को लेकर हैं। आंदोलन की शुरुआत पेरिस के गरीब इलाकों से हुई थी, जो अब पूरे देश में फैल चुका है। प्रदर्शन के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा मानने से इनकार कर दिया।
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क्या प्रदर्शन में सिर्फ छात्र शामिल हैं?
मंगलवार को कई शहरों में छात्रों के साथ शिक्षक और अभिभावक भी मार्च में शामिल हुए। कुछ जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, जबकि कुछ शहरों में हालात बिगड़ गए।
मार्से और नांत में प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर नारे लगाए। टूलूज में अभिभावक मार्च के आगे नजर आए।
स्ट्रासबर्ग, लियोन और रेनेस में कुछ प्रदर्शनकारियों ने आगजनी की और चीजें फेंकीं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया।
ट्रंप ने प्रदर्शन को शिक्षा से अलग क्यों बताया?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर कहा कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, वह बेलगाम बड़े पैमाने के प्रवासन का नतीजा है। उन्होंने कहा कि यह स्कूलों का मामला नहीं, बल्कि इस्लाम के फ्रांस पर कब्जा करने की कोशिश का मामला है। ट्रंप का यह बयान यूरोप में बड़े पैमाने पर प्रवासन को लेकर उनके लंबे समय से चले आ रहे रुख के मुताबिक है। वह पहले भी यूरोपीय देशों की प्रवासन नीतियों की आलोचना करते रहे हैं।
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फ्रांस सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव क्यों बढ़ा?
प्रदर्शन फैलने के बाद फ्रांस सरकार ने दंगा पुलिस की तैनाती की है। अधिकार समूहों, छात्र संगठनों और अभिभावकों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि खासकर नाबालिग प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि आंदोलन के कुछ हिस्सों में बाहरी समूह और हिंसक तत्व शामिल हो गए हैं, जिससे शिक्षा से जुड़े मूल मुद्दे पीछे छूट रहे हैं।
यूनियन सिंडिकेल लिसेन का दावा है कि करीब 2,000 हाईस्कूल बंद रहे और कुछ विश्वविद्यालय भी आंदोलन में शामिल हुए।
शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक, 891 स्कूलों में कक्षाएं पूरी तरह या आंशिक रूप से प्रभावित हुईं। कुछ स्थानीय शिक्षा अधिकारियों ने पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑनलाइन कक्षाओं का सहारा लिया।
स्कूलों में कौन-कौन सी समस्याएं हैं जिनसे नाराजगी बढ़ी?
प्रदर्शन कर रहे छात्रों और अभिभावकों की शिकायत केवल शिक्षकों या स्कूल के बजट तक सीमित नहीं है। कई जगह स्कूलों की इमारतों की हालत खराब है। छतों के खराब होने, कर्मचारियों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की दिक्कतों की शिकायतें सामने आई हैं। कुछ स्कूलों में चूहों के होने की बात भी कही गई है। सरकार ने इन समस्याओं में सुधार के लिए कदम उठाने का भरोसा दिया है, लेकिन प्रदर्शन अभी जारी है।
प्रदर्शनकारी संगठनों और सरकार के आंकड़ों में बड़ा अंतर है। यही वजह है कि आंदोलन के वास्तविक असर को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। हाईस्कूल छात्रों के संगठन का दावा है कि फ्रांस के आधे से ज्यादा हाईस्कूल या तो बंद रहे या उनके बंद होने की उम्मीद थी। सरकार ने इससे कम आंकड़ा दिया है।