वैज्ञानिकों ने अब तक के सबसे बड़े आनुवंशिक अध्ययन में बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (बीपीडी) से जुड़े जीनोम के 11 महत्वपूर्ण स्थानों की पहचान की है। शोध से पता चला कि इस बीमारी में जीन की अहम भूमिका है, हालांकि केवल आनुवंशिकी इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। बीपीडी से जुड़े कई जीन अवसाद, एडीएचडी और पीटीएसडी जैसी अन्य मानसिक बीमारियों से भी जुड़े पाए गए हैं।
बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (बीपीडी) जैसी जटिल मानसिक बीमारी को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। अब तक के सबसे बड़े आनुवंशिक अध्ययन में पहली बार मानव जीनोम के 11 ऐसे स्थानों (लोसी) की पहचान की गई है, जिनका संबंध इस बीमारी के बढ़े हुए आनुवंशिक जोखिम से है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज बीपीडी की जैविक पृष्ठभूमि को समझने, बेहतर उपचार विकसित करने और इस विकार पर भविष्य में होने वाले शोध को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
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कितने लोगों का जुटाया गया आंकड़ा?
नेचर जेनेटिक्स पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में यूरोपीय मूल के 10 लाख से अधिक लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इससे पहले इस बीमारी पर केवल एक बड़े स्तर का आनुवंशिक अध्ययन हुआ था, लेकिन उसमें कोई स्पष्ट आनुवंशिक संकेत नहीं मिला था। इस बार बड़े पैमाने पर जुटाए गए आंकड़ों ने पहली बार बीपीडी और आनुवंशिक कारकों के बीच स्पष्ट संबंधों को उजागर किया है। यह एक गंभीर मानसिक विकार माना जाता है।
आखिर इस बीमारी में जीन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
अध्ययन के अनुसार, पहचाने गए आनुवंशिक कारक बीपीडी के कुल वंशानुगत जोखिम का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा स्पष्ट करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि इस बीमारी के विकास में आनुवंशिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन केवल जीन इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हैं। इससे पहले परिवारों और जुड़वां बच्चों पर किए गए अध्ययनों में अनुमान लगाया गया था कि बीपीडी में वंशानुगत योगदान 46 से 69 प्रतिशत तक हो सकता है।
क्या बीपीडी से जुड़े जीन अन्य मानसिक बीमारियों से भी जुड़े हैं?
शोध में यह भी सामने आया कि बीपीडी से जुड़े कुछ आनुवंशिक बदलाव अवसाद, एंटीसोशल व्यवहार, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) और अन्य मानसिक तथा विकास संबंधी विकारों से भी जुड़े हुए हैं। सबसे मजबूत आनुवंशिक संबंध पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के साथ पाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक आघात और पहचान से जुड़ी समस्याओं का इस बीमारी के विकास से गहरा संबंध हो सकता है।