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क्या अफगानिस्तान में सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों ने किए ‘युद्ध अपराध’ किए, अमेरिका और ब्रिटेन भी करें जांच

Sat, 21 Nov 2020 02:00 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

ऑस्ट्रेलिया के सैनिक अफगानिस्तान के मोटे तौर पर उरुजगान प्रांत में तैनात थे। लेकिन बीच-बीच में नशीली दवाओं का कारोबार रोकने के लिए उन्हें हेलमांद प्रांत भी भेजा गया था। हेलमांद प्रांत में ब्रिटिश सैनिक तैनात थे...
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Afghanistan attack - फोटो : For Refernce Only
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विस्तार
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खुद ऑस्ट्रेलियाई सेना की जांच में इस बात की पुष्टि होने के बाद कि ऑस्ट्रेलिया के फौजियों ने अफगानिस्तान में 39 निर्दोष और निहत्थे लोगों की हत्या की, अब ये मांग उठ रही है कि ऐसी जांच उन तमाम देशों को कराने चाहिए जिन्होंने अपने सैनिक अफगानिस्तान में तैनात किए थे। सितंबर 2001 में हुए अमेरिका पर आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका और उसके साथी देशों ने अफगानिस्तान पर हमला किया था। उसी सिलसिले में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों के सैनिक अफगानिस्तान में तैनात किए गए थे।

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अब काबुल स्थित अफगानिस्तान इंडिपेंडेंट ह्यूमन राइट्स कमीशन (एआईएचआरसी) ने मांग की है कि अमेरिका और ब्रिटेन को भी उनके सैनिकों पर लगे गैर- कानूनी हत्याओं के तमाम आरोपों की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। एआईएचआरसी की अध्यक्ष शहारजाद अकबर ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में हुई जांच से साबित हो गया है कि अफगानिस्तान में तैनात सैनिक हिंसा और क्रूरता के अमानवीय कृत्यों में शामिल थे। उन्होंने कहा कि खासकर ऐसे आरोप ब्रिटिश सैनिकों पर भी लगे थे, इसलिए ब्रिटेन को स्वतंत्र जांच बैठानी चाहिए ताकि उसकी सेना की भूमिका की जांच एवं संपूर्ण समीक्षा हो सके।   


ऑस्ट्रेलियाई जांच में अफगान लोगों की हत्याओं और उन्हें असाधारण यातना देने की कई घटनाओं की पुष्टि हुई है। इस जांच में 39 हत्याओं की पहचान की गई है। साथ ही उन्हें अंजाम देने वाले 25 ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के नाम बताए गए हैं। इनमें ऐसी घटनाएं भी हैं, जिनमें किसी निहत्थे व्यक्ति को मारने की प्रतिस्पर्धा कराई गई। ऐसे व्यक्तियों को निशाना बनाकर नौजवान सैनिकों को यह लक्ष्य दिया गया कि उनके बीच से सबसे पहले कौन उसे मार डालता है। चार साल तक चली जांच के बाद इन घटनाओं का पूरा ब्योरा इसी हफ्ते ऑस्ट्रेलियाई सेना ने जारी किया।
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ऑस्ट्रेलिया के सैनिक अफगानिस्तान के मोटे तौर पर उरुजगान प्रांत में तैनात थे। लेकिन बीच-बीच में नशीली दवाओं का कारोबार रोकने के लिए उन्हें हेलमांद प्रांत भी भेजा गया था। हेलमांद प्रांत में ब्रिटिश सैनिक तैनात थे। ऑस्ट्रेलियाई जांचकर्ताओं ने ब्रिटेन, अमेरिका, और कनाडा के अफगानिस्तान में तैनात रहे सैनिक दस्तों से भी संपर्क कर उनसे जानकारी हासिल की थी।

अफगानिस्तान के सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि एआईएचआरसी और दूसरे कई मानवाधिकार संगठनों ने अपनी जांच में अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के सबूत पाए थे। उन्होंने इस बात के सबूत भी जुटाए थे कि यहां तैनात विदेशी बलों ने दूसरे देशों में सशस्त्र टकरावों के लिए तय अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया।

इसलिए अब जरूरी है कि संबंधित देशों में स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि यह पता चल सके कि किस तरह अफगान लोगों की जिंदगी को मूल्यहीन समझा गया। एआईएचआरसी ने कहा है कि सिर्फ आगे और जांच और साक्ष्य जुटा कर ही पीड़ितों के परिवारों के साथ न्याय किया जा सकेगा।

ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने लंदन में कहा कि ऑस्ट्रेलिया में हुई जांच से ब्रिटिश सैनिकों पर कोई नया आरोप नहीं लगा है। प्रवक्ता ने कहा- हमारे सैनिकों ने उच्च प्रतिमानों का पालन किया। हमारी सर्विस पुलिस ने अफगानिस्तान में हमारे सैनिकों पर लगे दुर्व्यवहार के आरोपों की विस्तृत और स्वतंत्र जांच की थी, लेकिन उनमें किसी आरोप की पुष्टि नहीं हुई। प्रवक्ता ने कहा कि अगर नई खुफिया जानकारी या नए साक्ष्य सामने आते हैं, तो ब्रिटेन फिर जांच कराने को तैयार है।

ऑस्ट्रेलियाई जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में तैनात दस्तों के बीच दुराचरण पर परदा डालने की प्रवृत्ति थी। जब कभी कानून का उल्लंघन कर सैनिकों ने कोई हत्या या कोई अन्य कृत्य किया, तो सबूतों को मिटाने की कोशिश की गई। हर घटना को इस रूप में पेश किया गया, जैसे सैनिक की हर गतिविधि कानून सम्मत थी।

जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी सैनिकों के मन में एक तरह का खुद के श्रेष्ठ होने का भाव बैठा हुआ था। उनके मन में यह भाव था कि वे अफगानिस्तान में रहते हुए कानून से ऊपर हैं। नौजवान सैनिक अपने कमांडरों को देवता की तरह मानते थे, और उनके गैर-कानूनी निर्देशों का पालन करना भी अपना कर्तव्य समझते थे।

जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान नागरिकों, स्थानीय मानवाधिकार संगठनों और कुछ अन्य स्रोतों ने ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के आचरण के बारे में चेतावनी दी थी। लेकिन हर बार उसे नजरअंदाज कर दिया गया। ऐसे आरोपों को तालिबान का प्रचार समझ कर उनकी अनदेखी कर दी गई। अफगानिस्तान के मानवाधिकार संगठनों का सवाल है कि जो नजरिया तब ऑस्ट्रेलिया का था, क्या ब्रिटेन और दूसरे देश अब भी उसी नजरिए से नहीं चल रहे हैं?

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