पाकिस्तान में सुरक्षा संबंधी बढ़ते खतरों के बावजूद चीन ने बलूचिस्तान प्रांत में सोना और तांबे की खदानों का लीज और 15 साल के लिए बढ़वा लिया है। बलूचिस्तान प्रांत में हाल में कई घातक आतंकवादी हमले हुए हैं। वहां चीन विरोधी भावनाएं भी उभार पर हैं। बलूचिस्तान को आजाद कराने कि लिए आंदोलन चला रहे संगठनों का आरोप है कि चीन की परियोजनाओं से स्थानीय आबादी को कोई लाभ नहीं हुआ है। उलटे इनकी वजह से इस प्रांत का पर्यावरण खराब हुआ है।
हाल में चीन की परियोजनाओं को लेकर स्थानीय आबादी में खास नाराजगी देखी गई है। पिछले साल डासू पनबिजली संयंत्र पर घातक हमला हुआ था, जिसमें नौ चीनी इंजीनियर मारे गए थे। ये हमला उत्तर-पश्चिमी कोशिस्तान क्षेत्र में हुआ था। लेकिन जानकारों का कहना है कि सुरक्षा संबंधी ऐसे खतरों के बावजूद हाल में पाकिस्तान में तैनात चीनी कर्मियों की संख्या बढ़ी है। इन कर्मियों को चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) से जुड़ी परियोजनाओं के साथ-साथ अन्य परियोजना स्थलों पर भी तैनात किया गया है।
चीन के योजना मंत्रालय ने 2017 में बताया था कि उस समय पाकिस्तान में 60 हजार चीनी कार्यरत थे। जबकि 2013 में ये संख्या सिर्फ 20 हजार थी। वेबसाइट एशिया टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया है कि अब पाकिस्तान में काम कर रहे चीनियों की संख्या लगभग चार लाख है। हालांकि इस बारे में कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
अमेरिकी पत्रिका फॉर्च्यून ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में बताया है कि दुनिया की सर्वोच्च 500 कंपनियों की सूची में जो 143 चीनी कंपनियां शामिल हैं, उनमें से आधी से ज्यादा पाकिस्तान में कारोबार कर रही हैं। विश्लेषकों का कहना है कि चीन की नजर बलूचिस्तान प्रांत के समृद्ध खनिज भंडारों पर है। इसीलिए वहां चीनी कंपनियों का दखल बढ़ा है। यही बलूचिस्तान में फैली चीन विरोधी भावना का मुख्य कारण है।