दुनिया भर में कोरोना वायरस (COVID-19) से मरने वालों की संख्या 37 हजार से भी ज्यादा हो चुकी है। अभी दुनिया भर में कुल संक्रमित लोग 7,84,314 हैं। भारत में ये संख्या 1200 के पास पहुंच चुकी है। भारत में कोरोना वायरस से अब तक 32 लोगों की मौत हो चुकी है। कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर लगातार शोध हो रहे हैं। ताकि इस वायरस के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करके इसकी वैक्सीन तैयार की जा सके। अमरीका में कोरोना वायरस से संक्रमण का मामला चीन से करीब दोगुना हो गया है। जर्मनी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है लेकिन जर्मनी के आंकड़ों को देखें तो यहां मृत्यु दर बहुत कम है। क्या आप जानते हैं यहां मृत्यु दर कम होने के पीछे क्या कारण है? क्या भारत को इससे सीखने की जरूरत है?
मृत्यु दर उम्र और सामान्य स्वास्थ्य जैसे कारकों पर भी निर्भर करती है। कोरोना वायरस संक्रमण की सूरत में किसका टेस्ट होना है और किसका नहीं, इसे लेकर सभी देशों के अपने अलग-अलग मानदंड है। भारत में केवल उन्ही लोगों का टेस्ट किया जा रहा है जिन्होंने दूसरे देशों की यात्राएं की हैं लेकिन जर्मनी के मामले में ऐसा नहीं है।
जर्मनी के पास अपना विकेंद्रीकृत मेडिकल सिस्टम है जो कि अन्य यूरोपीय देशों, इतना ही नहीं अमेरिका या भारत में भी नहीं है। वहां सरकार जर्मनी के सभी 16 संघीय राज्यों में टेस्टिंग प्रक्रिया को नियंत्रित नहीं करती।
इंपीरियल कॉलेज लंदन के हालिया अध्ययन के मुताबिक जिनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है उनमें मृत्यु दर की आशंका 10 गुना बढ़ जाती है जबकि 40 से कम उम्र वालों में बहुत कम। ये एक तरह से आपकी इम्यून सिस्टम पर भी निर्भर करता है। इस मामले में जर्मनी ने समझदारी दिखाते हुए सभी उम्रदाराज लोगों से युवा का संपर्क लगभग न के बराबर कर दिया।