कोरोना महामारी के कारण दुनियाभर में अब तक 35.41 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसी बीच ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि महामारी के कारण दुनियाभर में चल रहे लॉकडाउन के कारण बैक्टीरियल इन्फेक्शन से जुड़ी जानलेवा बीमारियों में गिरावट आई है। इससे निमोनिया, मेनिनजाइटिस और सेप्सिस जैसी बीमारियों से होने वाली लाखों मौतों को रोक लिया गया है।
सह-शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो के संक्रामक रोग विशेषज्ञ प्रो. डेविड मुर्डोक का कहना है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए वैश्विक स्तर पर लगे लॉकडाउन से लाखों लोगों की जिंदगी बच गई है। वह बताते हैं कि लॉकडाउन के कारण जानलेवा बैक्टीरिया से बच्चों और वयस्कों में होने वाली जानलेवा बीमारियां में गिरावट आई है। ये बीमारियां भी लोगों को श्वसन तंत्र से ही फैलती हैं। एजेंसी
लॉकडाउन से हर देश में घटे मरीज
वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्ष 2016 में दुनियाभर में 3.36 करोड़ लोगों में श्वसन तंत्र के निचले हिस्से में संक्रमण का पता चला। अनुमान है कि इसमें से 24 लाख लोगों की मौत हो गई। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि दुनिया के सभी देशों में जनवरी और मई 2020 के बीच पिछले दो वर्षों की तुलना में छह हजार कम मरीज मिले हैं। दावा है कि मरीज कम मिले हैं तो मौतों का आंकड़ा भी कम हुआ है।
संख्या घटने की एक वजह ये भी
वैज्ञानिकों का कहना है कि संख्या घटने की एक वजह ये भी हो सकती है कि लॉकडाउन के कारण इस तरह की बीमारियों की डायग्नोसिस की दर कम हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि चार सप्ताह के लॉकडाउन में ऐसे मामलों में 68 फीसदी जबकि आठ सप्ताह के लॉकडाउन में 82 फीसदी की गिरावट देखी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनियाभर की सरकारों को कोरोना के साथ इस ओर भी ध्यान देना होगा।
लॉकडाउन से बढ़ी लोगों में भविष्य को लेकर चिंता
कोरोना महामारी ने दुनियाभर के लोगों पर शारीरिक और आर्थिक रूप से असर डालने के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डाला है। रोजगार जाने से लोगों के मन में भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी। महामारी से तंग लोगों में आत्महत्या के विचार आने के साथ ऐसे मामले भी बढ़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नकारात्मकता को हावी नहीं होने देना है।
ब्रिटेन के स्वानसी यूनिवर्सिटी, कार्डिफ यूनिवर्सिटी और नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए सर्वे में पता चला है कि लॉकडाउन में लोग मानसिक रूप से परेशान रहे। आइसोलेशन, घरेलू हिंसा, रिश्तों के बीच कड़वाहट और वित्तीय दिक्कतों के कारण उनमें आत्महत्या के विचार अधिक आए। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी रहे जिन्हें सब कुछ बेहतर होने की उम्मीद रही वे इस तरह की परेशानियों से दूर रहे। वैज्ञानिकों का कहना है कि महामारी की भयावहता को देख लोग भविष्य को लेकर अधिक चिंतित दिखे। नकारात्मकता के हावी होने के कारण कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपना जीवन खत्म करने का सोचा तो कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी जीवनलीला समाप्त भी कर ली। एजेंसी
लॉकडाउन खत्म होने के साथ राहत
स्वानसी यूनिवर्सिटी के मनोरोग विभाग की प्रो. निकोला ग्रे का कहना है कि लोगों में आत्महत्या के विचार आए लेकिन जैसे ही वे लॉकडाउन से बाहर आए उनके विचार बदल गए। ऐसे में कह सकते हैं कि घर में कैद रहने के कारण लोगों के मन में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ी। उन्हें इस बात का डर हो गया कि आगे जीवन मुश्किल होगा। इसी का नतीजा रहा कि लोग आत्महत्या जैसे कदम पर विचार करने को मजबूर हुए।
हिम्मत रखें, बुरा वक्त है कट जाएगा
एम्स, नई दिल्ली के मनोरोग विभाग के डॉ. राजेश सागर बताते हैं कि कोरोना महामारी के कारण जिंदगी में जो ठहराव आया है उससे लोग हताश हो गए हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनों को खो दिया है। लोगों के सामने घर-परिवार का खर्च चलाने की चुनौती है। सभी तरफ से निराशा हावी होगी तो ऐसे विचार आ सकते हैं। ऐसे में परिवार का हर सदस्य एक दूसरे को हिम्मत बंधाए। बुरा वक्त है कट जाएगा ऐसा विचार रखें।