कोरोना वायरस से मौत की दर
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आइए आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं...
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 30 मार्च तक कोरोना वायरस के 1,071 मामलों की पुष्टि हुई थी, जो 8 अप्रैल की शाम तक बढ़कर 5,200 से ज्यादा हो गई। इस तरह केवल 9 दिनों में ही भारत में कोरोना वायरस के मामलों में करीब पांच गुना बढ़ोत्तरी हो गई।
महज 5,000 से अधिक मामलों के साथ ही भारत में कोरोना से मृत्युदर दुनिया में आठवें स्थान पर है। अमेरिका, स्पेन, चीन, फ्रांस और ईरान जैसे इस वायरस से भयानक रूप से प्रभावित देशों में 5,000 मामलों को पार करने के बाद भारत की तुलना में कम मौतें हुईं।
5,000 संक्रमितों के साथ स्वीडन में मौत का आंकड़ा दुनिया में सबसे ज्यादा रहा। 3 अप्रैल तक स्वीडन में 282 मौतों के साथ कोरोना वायरस के 5,466 मामलों की पुष्टि हुई थी। करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस देश में कोविड-19 के कुल 7693 मामले सामने आए हैं। इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि स्वीडन ने अन्य यूरोपीय देशों की तरह सख्त लॉकडाउन के नियमों को लागू नहीं किया गया। लेकिन भारत में लॉकडाउन लगाने की बाद भी मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।
कोरोना वायरस से मौत की दर
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भारत में मृत्युदर क्यों ज्यादा
भारत में कोविड-19 से जिन लोगों की मौत हुई, उनमें से ज्यादातर मामलों में मरीज डायबिटीज और हाइपरटेंशन (बीपी) की समस्या से पीड़ित थे। ऐसे में भारत के लिए खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि आईसीएमआर की रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 9.4 फीसदी लोगों को डायबिटीज है। 12 फीसदी शहरी आबादी और करीब 8 फीसदी ग्रामीण आबादी इन दोनों रोगों की चपेट में है। और ऐसे लोगों को कोरोना का खतरा ज्यादा है।
चीन के 44 हजार केसों के अध्ययन के बाद यह बात सामने आई कि जिन मरीजों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी या सांस रोग था, उनमें मृत्यु की आशंका पांच गुना ज्यादा थीं। भारत में मामले में भी लगभग यही देखने को मिला।
इस वायरस से दुनियाभर में 1,453,804 लोग संक्रमित हैं। भारत में 5734 संक्रमितों के साथ 166 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि 473 मरीज ठीक भी हुए हैं।