विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को भी यूरोप से सीख लेनी चाहिए कि कैसे उसने कोरोना के मामले कम होने पर सुरक्षा उपायों में ढील नहीं दी और नियमों का सख्ती से पालन करना जारी रखा। पिछले साल 2020 की गर्मियों में कई देशों में कोरोना के मामले घटने लगे थे, लेकिन यूरोप कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का सामना कर रहा था। जुलाई के मध्य से स्पेन और फ्रांस में दूसरी लहर के शुरुआत के संकेत मिलने लगे थे और मामलों में बढ़त दिखने लगी थी।
फ्रांस, स्पेन, इटली और ब्रिटेन सभी यूरोपीय देशों में नए मामलों में बढ़ोतरी के साथ ही सबसे ज्यादा मौतें हुईं। यहां अस्पतालों में आधे आईसीयू बेड भर चुके थे। एक वेबसाइट द्वारा बनाए गए डेटाबेस के अनुसार, मार्च, अप्रैल और मई 2020 के महीनों में, यूरोप में हर दिन 35000 से 38000 कोविड-19 मामले दर्ज हो रहे थे। मामले बीच में कम हुए लेकिन पांच नवंबर को यूरोप ने एक ही दिन में 2.5 लाख से ज्यादा केस दर्ज किए।
जर्मनी में चांसलर एंजेला मर्केल ने अक्टूबर में कहा था कि अगर लोगों ने अपना व्यवहार नहीं बदला, तो क्रिसमस पर देश को प्रति दिन 19,000 नए संक्रमणों का सामना करना पड़ेगा और बिल्कुल ऐसा ही हुआ। 25 दिसंबर को 19487 केस दर्ज किए गए। कोरोना वायरस की दूसरी लहर के संकेत मिलते ही सभी यूरोपीय देश अलर्ट हो गए और कुछ अहम फैसले लिए गए। फ्रांस ने सख्त पाबंदियां लागू की गईं। बेल्जियम में रेस्तरां, बार और कैफे बंद कर दिए गए और रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक कर्फ्यू लागू कर दिया गया। मैड्रिड में 37 सबसे प्रभावित जगहों पर आंशिक लॉकडाउन लगाया गया। रेस्त्रां और रिटेल दुकानों पर लोगों की संख्या सीमित रखने का आदेश दिया गया।
यूरोपीय देशों ने पूरी तरह लॉकडाउन नहीं लगाया क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता। स्थानीय प्रतिबंध लगाए गए ताकि अर्थव्यवस्था को खुले रखते हुए वायरस के प्रसार को रोकने में मदद मिले। घर पर रहने का आदेश जारी करने की जगह बार, रेस्तरां या अन्य सार्वजनिक स्थानों को टारगेट किया गया, जहां अक्सर युवाओं की आवाजाही की संभावना हो सकती है। इसके पीछे वजह यह थी कि दूसरी लहर में वायरस युवाओं को ज्यादा शिकार बना रहा था, जिनकी इस बीमारी से मौत की संभावना कम होती है। इन कदमों के बाद मार्च की तुलना में मौतों और हॉस्पिटलाइजेशन की संख्या कम देखी गई।
भारत में भी यूरोप जैसी ही स्थिति है। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए अपनाए जा रहे उपाय भी यूरोपीय देशों से मिलते जुलते हैं। सभी जानते हैं कि कोरोना वायरस को कैसे रोकना है। इसके खिलाफ कैसे जंग लड़ना जारी रखना है पर इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल ही यही है कि क्या सच में भारत में हर कोई जमीनी स्तर पर कोविड-19 रोधी नियमों और गाइडलाइन का पालन कर रहा है? अगर ऐसा होता तो अनलॉक के दौरान लापरवाही न बरती जाती, सामाजिक दूरी के नियम को माना जाता, यात्रा प्रोटोकॉल का पालन न किया जाता व शादी जैसे समारोह में भीड़ एकित्रत न होती तो देश पर कोरोना की दुगनी मार न पड़ती।